संत हरिद्वार है और सत्संग गंगा स्नान – आचार्य प्रसन्नसागर जी महाराज

निमियाघाट, कोडरमा । अहिंसा संस्कार पदयात्रा के प्रणेता साधना महोदधि भारत गौरव उभय मासोपासी आचार्य प्रसन्न सागर जी महाराज निमियाघाट के सहस्त्र वर्ष पुरानी भगवान पारसनाथ की वरदानी छांव तले विश्व हितांकर विघ्न हरण चिंतामणि पारसनाथ जिनेंद्र महाअर्चना महोत्सव पर भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए।
अंतर्मना प्रसन्नसागरजी ने कहा — आदमी बड़ा नासमझ है दूसरों के विषय में जल्दी निर्णय कर लेता है कि वह कैसा है तुम एक मिनट में किसी को भगवान मान लेते हो तो दूसरे मिनट में ही वही तुम्हें शैतान नजर आने लगता तुम्हारी श्रद्धा बड़ी उथली और छिछली है बड़ी कमजोर है तुम्हारी श्रद्धा नाभि से नहीं फूटी है प्राणों से नहीं जन्मीहै अभी तुम्हारी श्रद्धा भक्ति मे लोभ और स्वार्थ ही भरा पड़ा है इसलिए एक पल में मुनि अच्छा हो जाता है श्रद्धाये हो जाता है और संत अगर तुम्हें दो शब्द कड़वे कह दे या तुम्हारी अपेक्षा कर दे तो तुम दूसरे पल ही उनकी निंदा आलोचना पर उतर आते हो कौन आदमी कैसा है इसका निर्णय जरा सोच समझ कर करो किसी के विषय में उसकी किसी एक क्रिया को देखकर एकदम से निर्णय ना करो कि वह क्या है थोड़ी प्रतीक्षा करो धैर्य से काम लो किसी को भी झट गुरु मत मान लेना उसे पहले अच्छी तरह से जांच लो परख लो फिर गुरु बनाओ फिर उसे प्रणाम करो और उसे एक बार गुरु मान लिया श्रद्धा से समर्पण कर दिया तो फिर कभी उसकी आलोचना मत करो उसमें कभी कमी मत खोजो फिर बात बात में तर्क मत करो उसे श्रद्धा से जियो उसके आदेशों का पालन करो
अंतर्मना प्रसन्नसागर ने कहा कि – सत्संग जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है जो बिना सध्यसह पुणे के संभव नहीं है संत दर्शन के लिए उठा एक-एक कदम एक एक यज्ञ के बराबर होता है संत बड़े करुणा शील होते हैं बे तुम्हारे कल्याण के लिए तप साधना करते हैं जैसे अहिल्या उद्धार के लिए श्री राम स्वयं द्वार पर गए थे वैसे ही तुम्हारे उद्धार और कल्याण के लिए तुम्हारे द्वार पर आते हैं तुम ही अहिल्या हो और संत राम के अवतार हैं । उक्त जानकारी मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा, नवीन जैन ने दी।