आचार्य विशोकानंद जी भारती ने सुनाए मधु-कैटभ व हयग्रीव प्रसंग





रतलाम । स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ का शुभारंभ हुआ। निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातः एवं सायंकाल कथा एवं प्रवचन आयोजित किए जा रहे हैं।
कथा शुभारंभ से पूर्व प्रातः 9 बजे श्रद्धालु श्री अखंड ज्ञान आश्रम में एकत्रित हुए। इसके बाद महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद जी भारती एवं महामंडलेश्वर स्वामी देव स्वरूपानंद जी ने भगवान शिव एवं जगदंबा का विधिवत पूजा-अर्चन किया। तत्पश्चात काटजू नगर स्थित शिव मंदिर से भव्य कलश यात्रा प्रारंभ हुई, जो विभिन्न मार्गों से होती हुई श्री अखंड ज्ञान आश्रम पहुंची।
कलश यात्रा में बड़ी संख्या में महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर कलश धारण कर शामिल हुईं। पुरुष श्रद्धालुओं ने भी भक्ति और उत्साह के साथ नृत्य करते हुए सहभागिता की। स्वामी जी खुली जीप में विराजमान रहे। मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्पमालाओं से उनका स्वागत किया तथा कलश यात्रा पर पुष्प वर्षा की। आश्रम पहुंचने पर श्रद्धालुओं द्वारा पोथी पूजन किया गया और इसी के साथ श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा का विधिवत शुभारंभ हुआ।
देवासुर संग्राम और भगवान विष्णु के जागरण का प्रसंग
कथा एवं प्रवचन में आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद जी भारती ने देवी भागवत के प्रसंगों का वर्णन करते हुए कहा कि देवासुर संग्राम के समय देवताओं में हाहाकार मच गया और सभी ने भगवती की आराधना करते हुए भगवान विष्णु को योग निद्रा से जगाने की प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि जब भगवान योगनिद्रा में होते हैं तो सृष्टि के संचालन में भी विशेष स्थिति उत्पन्न होती है और देवताओं ने माता से भगवान को जागृत करने की प्रार्थना की।
उन्होंने हयग्रीव प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि हयग्रीव ने दस हजार वर्षों तक भगवती की तपस्या की। देवी ने प्रसन्न होकर उसे वरदान मांगने को कहा। हयग्रीव ने अमरत्व का वरदान मांगा, जिस पर देवी ने समझाया कि जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। इसके बाद हयग्रीव ने ऐसा वर मांगा कि उसकी मृत्यु केवल घोड़े के मुख वाले से ही हो। आगे चलकर भगवान विष्णु ने हयग्रीव का वध किया।
मधु-कैटभ का भी हुआ वध
प्रवचन में आचार्य महामंडलेश्वर ने मधु-कैटभ प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि महामाया ने भगवान विष्णु को योगनिद्रा में सुला दिया था। इसी दौरान उनके कान के मैल से मधु और कैटभ नामक असुर उत्पन्न हुए। दोनों ने भी देवी की तपस्या कर वरदान प्राप्त किया था।
उन्होंने बताया कि भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ को धर्मयुद्ध के लिए ललकारा। दोनों असुरों ने अपने बल और वरदान के अभिमान में भगवान को ही वरदान देने की बात कही। भगवान विष्णु ने अपनी लीला से उन्हें जल से बाहर भूमि पर लाकर उनका अंत किया। उन्होंने कहा कि देवी की कृपा से ही भगवान विष्णु ने असुरों का संहार कर सृष्टि व्यवस्था को पुनः संतुलित किया। कथा के पश्चात आरती संपन्न हुई। प्रसाद की व्यवस्था सुनीता एवं प्रदीप कपाड़िया, मेम्फिस, टेनेसी (अमेरिका) की ओर से की गई।
महामंडलेश्वर स्वामी देव स्वरूपानंद जी ने बताया कि श्रीमद् देवी भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन प्रारंभ हो गया है। दिव्य चातुर्मास महोत्सव की पूर्णाहुति हवन 26 सितंबर को आयोजित किया जाएगा। कथा एवं प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।