अन्तर्मना के सानिध्य भव्य पंच जेनश्वरी दीक्षा समारोह दि.22 मई को

निमियाघाट/कोडरमा। जैन धर्म मे दीक्षा के बाद भगवान बनने का मार्ग प्रसस्त होता है भारत गौरव साधनामहोदधि तपाचार्य उभयमसौपवासी अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के सानिध्य सौम्य मूर्ति मुनि श्री पीयूष सागर जी महाराज के निर्देशन में ऊर्जावान भूमि के अलौकिक आध्यत्मिक अभूतपूर्व अतिमहान सर्वश्रेष्ट सर्वजेष्ठ सम्मेद शिखर पर्वत की पार्श्व तहलटी के निमिया घाट में विराजमान अतिशयकारी पार्श्वनाथ भगवान की वरदानी छाव तले सत्य सम तट शांति संतोष को देने वाली भव्यतिभव्य पंच भव्य पंच जेनश्वरी दीक्षा समारोह का मंगलमय कार्यक्रम दि.22 मई 2021 प्रातः 10 बजे होगा। प्रवक्ता रोमिल जैन सोनकच्छ, पीयूष कासलीवाल, नरेंद्र अजमेरा औरंगाबाद,कोडरमा मीडिया प्रभारी राजकुमार अजमेरा,नवीन जैन ने बताया कि निमियाघाट झारखण्ड जैन मंदिर में अन्तर्मना पदमप्रभु गुरुभक्त परिवार व अन्तर्मना धार्मिक व पारमार्थिक न्यास आयोजन समिति द्वारा समस्त आयोजन शाषन प्रशासन की गाइड लाइन को ध्यान में रखते हुए होगा। जहा विशेष रूप से पंच जेनश्वरी दीक्षा के अंतर्गत गुरुदेव के संघत ऐलक श्री पर्व सागर जी की मुनि दीक्षा, भैया श्री भरत भेयावत जी की मुनि दीक्षा, व भवरी देवी जी धूलियांन बंगाल,श्री मति सरोज भेयावत , श्री मति राजमती भेयावत परतापुर राजस्थान की छुल्लिका दीक्षा होगी। कार्य्रकम के पुण्यार्जक परिवार श्री मान पन्नालाल जी बेंगलोर, व श्री मान हीरालाल जी रक्षा देवी पहाड़िया आसाम होंगे।
क्या होती जैन धर्म मे दीक्षा:-
जैन धर्म में दीक्षा लेना यानी सभी भौतिक सुख-सुविधाएं त्यागकर एक सन्यासी का जीवन बिताने के लिए खुद को समर्पित कर देना. जैन धर्म में इसे ‘चरित्र’ या ‘महानिभिश्रमण’ भी कहा जाता है. दीक्षा समारोह एक कार्यक्रम होता है जिसमें होने वाले रीति रिवाजों के बाद से दीक्षा लेने वाले दीक्षार्थी भाई या बहन एक साधु का जीवन व्यापन करते है।
दीक्षा लेने के साथ ही सभी को इन पांच व्रतों के पालन के लिए भी समर्पित होना पड़ता है:
अहिंसा: किसी भी जीवित प्राणी को अपने तन, मन या वचन से हानि ना पहुंचाना
सत्य: हमेशा सच बोलना और सच का ही साथ देना
अस्तेय: किसी दूसरे के सामन पर बुरी नजर ना डालना और लालच से दूर रहना
ब्रह्मचर्य: अपनी सभी इन्द्रियों पर काबू करना और किसी से साथ भी संबंध ना बनाना अपरिग्रह: जितनी जरुरत है उतना ही अपने पास रखना, जरूरत से ज्यादा संचित ना करना दीक्षा लेने के लिए और उसके बाद सभी साधुओं और साध्वियों को अपना घर, कारोबार, महंगे कपड़े, ऐशो-आराम की जिंदगी छोड़कर पूरी तरह से सन्यासी जीवन में डूब जाना पड़ता है. इस प्रक्रिया का आखिरी चरण पूरा करने के लिए सभी साधुओं और साध्वियों को अपने बाल अपने ही हाथों से उखाड़कर सिर से अलग करने पड़ते हैं. जिसे केशलोंचन कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जीवन पर्यन्त धर्म अनुसार पदवी अनुरूप जैसा शास्त्र में बताया गया है उसके अनुसार जीवन पर्यंत कही भी जाने के लिए पैदल ही चलना होता हैं। साथ ही हमेशा के लिए अपने दीक्षा आचार्य गुरु का शिष्ययत्व स्वीकार कर उनके बताए मार्ग पर चलना होता है।

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