माँ की स्मृति में पाँचाल परिवार की अनूठी पहल, पौधारोपण के साथ समाजसेवा का संदेश

  • ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान से मातृस्मृति को दिया पर्यावरण संरक्षण का स्वरूप; समाजजनों को पौधे, कपड़े के बैग और मटकियाँ वितरित कर जल संरक्षण व प्लास्टिक मुक्त समाज का किया आह्वान

रतलाम। माँ की ममता, त्याग और संस्कारों को समाजसेवा के माध्यम से जीवंत रखने की प्रेरणादायी पहल करते हुए पाँचाल परिवार ने स्वर्गीय श्रीमती मोतिया बाई पाँचाल (मोरदा वाले) की स्मृति में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ कार्यक्रम आयोजित किया। माताजी की पगड़ी रस्म के अवसर पर बड़बड़ हनुमान मंदिर स्थित जानकी मंडप में आयोजित इस कार्यक्रम में पौधारोपण के साथ पर्यावरण संरक्षण, जल बचाने और प्लास्टिक मुक्त समाज का संदेश दिया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन, समाजसेवी, विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि और परिवारजन शामिल हुए।
स्वर्गीय मोतिया बाई पाँचाल के पुत्र रमेश पाँचाल और राकेश पाँचाल द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में मातृस्मृति को सामाजिक सरोकारों से जोड़ते हुए समाजहित में अनेक प्रेरणादायी कार्य किए गए। इस अवसर पर समाजजनों को पौधे, कपड़े के बैग और मटकियाँ वितरित की गईं। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को दान एवं सहयोग प्रदान कर सेवा और सहयोग की भावना को भी आगे बढ़ाया गया।

मातृस्मृति में पौधारोपण, समाज को हरियाली का संदेश
कार्यक्रम के दौरान स्वर्गीय मोतिया बाई पाँचाल की स्मृति में पौधारोपण कर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस पहल के माध्यम से संदेश दिया गया कि माँ की स्मृतियों को केवल यादों तक सीमित रखने के बजाय प्रकृति की सेवा और समाज के कल्याण से जोड़कर भी सदैव जीवंत रखा जा सकता है।
पाँचाल परिवार ने समाजजनों को पौधे वितरित कर अधिक से अधिक पौधारोपण करने और उनकी देखभाल करने का आह्वान किया। माँ की स्मृति में लगाया गया पौधा आने वाले समय में वृक्ष बनकर पर्यावरण को समृद्ध करेगा और भावी पीढ़ियों को भी मातृप्रेम, त्याग और संस्कारों की याद दिलाता रहेगा।

मटकी और कपड़े के बैग के माध्यम से दिया जनजागरूकता का संदेश
कार्यक्रम में जल संरक्षण और प्लास्टिक मुक्त समाज के उद्देश्य को विशेष रूप से शामिल किया गया। समाजजनों को मटकियाँ वितरित कर जल बचाने तथा पानी के महत्व के प्रति जागरूक किया गया। वहीं, प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग को कम करने के उद्देश्य से कपड़े के बैग वितरित किए गए और लोगों से दैनिक जीवन में प्लास्टिक के स्थान पर पर्यावरण हितैषी विकल्प अपनाने की अपील की गई।
पौधे, मटकी और कपड़े के बैग का वितरण कार्यक्रम को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित न रखते हुए जनजागरूकता और सामाजिक सहभागिता से जोड़ने का माध्यम बना। परिवार की इस पहल ने पर्यावरण संरक्षण के तीन महत्वपूर्ण संदेशों को एक साथ समाज के सामने रखा—पेड़ लगाएं, पानी बचाएं और प्लास्टिक का उपयोग कम करें।

सामाजिक संस्थाओं को दान देकर जनसेवा को दिया बढ़ावा
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को दान एवं सहयोग भी प्रदान किया गया। समाजसेवियों और संस्थाओं के प्रतिनिधियों की सहभागिता ने आयोजन को सामाजिक सेवा और सहयोग का स्वरूप प्रदान किया। इस अवसर पर समाजजनों ने पाँचाल परिवार की पहल को मातृस्मृति के साथ समाजहित के कार्यों को जोड़ने का प्रेरणादायी प्रयास बताया।
परिवार की ओर से किए गए इन कार्यों का उद्देश्य समाज में सेवा, सहयोग और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करना रहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की सहभागिता ने यह संदेश दिया कि व्यक्तिगत स्मृतियों को सामूहिक प्रयासों के माध्यम से समाज के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है।

माँ के संस्कारों को समाजहित के कार्यों में किया जीवंत
माँ केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि जीवनभर मिलने वाली ममता, संस्कार और आशीर्वाद की अनमोल छाया होती हैं। उनके दिए संस्कार ही संतान को जीवन में सेवा, त्याग और परोपकार की राह दिखाते हैं। स्वर्गीय मोतिया बाई पाँचाल की स्मृति में आयोजित इस कार्यक्रम के माध्यम से उनके पुत्र रमेश पाँचाल और राकेश पाँचाल ने मातृप्रेम को समाजसेवा और प्रकृति संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया।
पाँचाल परिवार की यह पहल भावनात्मक श्रद्धांजलि के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का भी संदेश बनी। माँ की स्मृति में लगाया गया पौधा, समाजजनों को वितरित की गई मटकियाँ और कपड़े के बैग तथा विभिन्न संस्थाओं को दिया गया सहयोग इस बात का प्रतीक बने कि अपनों की यादों को समाज के कल्याण से जोड़कर लंबे समय तक जीवंत रखा जा सकता है।
‘एक पेड़ माँ के नाम’ के माध्यम से पाँचाल परिवार ने मातृस्मृति को पर्यावरण संरक्षण, जल बचाने, प्लास्टिक मुक्त समाज और जनसेवा के संकल्प में बदलते हुए एक प्रेरणादायी पहल की।

परिवारजन रहे उपस्थित
कार्यक्रम में पाँचाल परिवार के सदस्य, समाजजन, समाजसेवी एवं विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

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