लता जी का जाना एक ऐसे युग का अवसान है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता

सम्मेदशिखर जी । अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने मोन साधना में मुनि श्री 108 पीयूष सागर जी महाराज की वाणी में बताया कि*
*णमोकार मंत्र की अनुगुन्जना करने वाली स्वर-कोकिला, सुर साधिका लता जी काल के क्रूर हाथों, सुरो की कलानिधि, देह से विदेह की लम्बी यात्रा पर निकल गई। लता जी का जाना एक ऐसे युग का अवसान है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। आज यदि राष्ट्र शोकाकुल है। उनकी मीठी यादों को, संस्मरणों को, अपनी अपनी तरह संजोने में भी लगा है तो सिर्फ इसलिए कि उनके हृदयासन पर परमात्मा बसता था और कण्ठ में माँ सरस्वती। भावों में सरलता, सहजता और विनम्रता कूट कूट के उभरती थी। तभी तो जब भी कोई संकट आया तो उन्होंने सक्रियता- संवेदना तो दिखाई ही, लेकिन अपनी तरफ से भरसक योगदान भी दिया। *इसलिए देश की थाती थी।
उनके जैसी यश़कीर्ति और आदर-सत्कार शायद ही किसी को मिला हो, पांच पीढियों में सुरो की मीठास घोलने वाली लता मंगेशकर लय की विलय में विलीन हो गई। अब संगीत की रस धार हो रही है विकल, क्योंकि नहीं है व्योम में कहीं कोई विकल्प, जो कर सके स्वरों को जीवन्त, प्राणवंत, भाषा-बोलियों की जो सीमा से परे हैं। वाग्देवी की लाडली शारदसुता थी। लता जी – श्रुत देवी के चरणों में पहुंच गई है शारदापुर – आत्मसंगीत का लेने अविराम आलाप। देह के विलय की बेला के रूपांतरण के इन क्षणो में, उनके भव मुक्ति के लिये अन्तर्मना के अन्तर्मन से अनन्त आशीष एवं प्रार्थना परमात्मा से लता जी जब भी जन्म ले, वो भारत की वसुन्धरा पर ही ले… । उक्त जानकारी राज कुमार जैन अजमेरा,मनीष सेठी,कोलकोता से विवेक जैन गंगवाल ।