(मानक शाह जैन, इंदौर)

13 फरवरी 1957 को राजस्थान के एक छोटा से गांव डूंगला (चित्तौडगढ़़) में नागौरी परिवार में एक बालक ने जन्म लिया था। श्रीमती मनोहरबाई- गुलाबचंदजी नागौरी की पुष्प वाटिका में जन्म लिए इस बालक का नाम कोमलचंद नागौरी रखा गया था।
फरवरी 1957 से अप्रैल 1980 तक की सांसारिक यात्रा में कोमल का ह्रदय मोह भंग के अंतिम पड़ाव तक पहुंच गया। सांसारिक मोह माया, पारिवारिक बंधनों, रिश्ते नातों की दुनिया से बहुत दूर जा चुके इस बालक ने 23 वर्ष की अवस्था में सांसारिक वैभव, भोग विलास आदि से मुक्त होने का दृढ़ निश्चय कर लिया।
मेवाड़ भूषण परम पूज्य श्री प्रतापमलजी महाराज के कर कमलों से दिनांक 22 अप्रैल 1980 को ग्राम डूंगला में श्वेत वस्त्र धारण कर स्वयं को भगवान महावीर के चरणों में समर्पित कर जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण की और अपने संयम यात्रा की ओर कदम बढ़ा दिए, एक ऐसे पथ पर जहां सांसारिक सुख और वैभव नही था, यदि कुछ था तो वह था, संयम यात्रा का दुर्लभ पथ।
संयम यात्रा के इस पथिक में पूज्य श्री कमलमुनि कमलेश ने लगभग 70 हजार से ज्यादा किलोमीटर की पैदल यात्रा (विहार) में कश्मीर से कन्याकुमारी तक, मुम्बई से नेपाल तक पदयात्रा के माध्यम से न केवल सम्पूर्ण भारत में ख्याति अर्जित की अपितु गौरक्षा, मानव सेवा के शिक्षा के क्षैत्रमें अपने पूज्य गुरु श्री रमेश मुनिजी म. सा. के सानिध्य में ज्ञान के भंडार को भी अपनी झोली में संग्रहित कर लिया। आपने 32 आगम, थोकड़े, गीता, रामायण, बाइबिल, जीव विज्ञान आदि में अपनी महारथ हासिल कर ली। जैन दिवाकर गुरूदेव श्री चौथमलजी म.सा. के विचारों के अनुरूप हनुमानरूपी भक्त बनकर धर्म प्रचार-प्रसार में समर्पित रहकर कार्य कर रहे है और अपने दीक्षा प्रदाता दादा गुरु और दीक्षा गुरु के सानिध्य में निज ज्ञान के कोष को भरते गए।
अपनी संयम यात्रा में आप कभी भी कठिन परिस्थितियों से विचलित नहीं हुए बल्कि उनका सामना किया और हासिल किया अपने उद्देश्य को। आपके द्वारा की गई ज्ञान साधना, धर्म आराधना और जिनवाणी के प्रचार प्रसार ने आपको उस मुकाम तक पहुंचा दिया, जहा पहुंचकर आपने संघ समाज में एक नई ऊर्जा का संचार किया।
देश के विभिन्न प्रांतों में हजारों किलोमीटर की पद यात्रा कर समाज में जागृति लाने के लिए उन्होंने हर संभव नए नए प्रयोग किए। भगवान महावीर की अहिंसा को जन जन तक पहुंचाने के प्रयास में उन्होंने पूरी शक्ति का उपयोग किया। उन्होंने न केवल शाकाहार के प्रति जन साधारण को प्रेरित किया अपितु मांसाहारी अजैन समाज को भी शाकाहारी भोजन के गुण और प्रभाव बतलाए और उन्हे मांसाहार से मुक्त किया। यह उनकी बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
जीवदया के क्षेत्र में उनकी महत्वपूर्ण योजना राष्ट्रव्यापी स्तर पर सराहना का केंद्र बनी। मूक पशु-पक्षियों के लिए किया गया उनके मिशन की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। गौरक्षा आपके संयमी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। विभिन्न प्रांतों में स्थापित सैकड़ों गौशालाये इसका प्रमाण है। आपने गौशाला शुरू करने को ही अपने कर्तव्य का अंत नही समझा वरन उसके संचालन में भी रुचि प्रदर्शित की।
गुरूदेव द्वारा अपने संयम यात्रा के दौरान राजगिर (बिहार) में राष्ट्रसंत कमलमुनि कमलेश विद्यालय एवं रतलाम (म.प्र.) जैन दिवाकरीय कमलमुनि कमलेश विद्यालय की स्थापना अखिल भारतीय जैन दिवाकर विचार मंच नई दिल्ली के माध्यम संस्था की निजी भूमि पर विद्यालय की स्थापना करवाई गई । आज वर्तमान में उक्त विद्यालयों में गरीब, दलित, आदिवासी के बच्चों को शिक्षा का अध्ययन करवा कर सेवा कार्य किया जा रहा है ।
आपकी सोच सदैव सकारात्मक रही। यही कारण था कि आप अपनी समन्वयकारी दृष्टिकोण व सकारात्मक विचारधारा के कारण लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचे। सर्वधर्म एकता की एक नई सोच को आपने जन्म दिया। श्वेता, दिगम्बर, मूर्तिपूजक संप्रदाय को एक मंच पर लाकर अपने जैन एकता के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान दिया। जैन समाज में एकतावादी दृष्टिकोण के अतिरिक्त आपने सर्वधर्म एकता पर भी वैचारिक आदान प्रदान किया। हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, पारसी, बोहरा, ईसाई आदि धर्मो के धर्मगुरुओं के साथ अपने संबंध विकसित कर सर्व धर्म एकता एवं समन्वय का संदेश दिया । आप अपनी संयम यात्रा के दौरान गौरक्षा सम्मेलन, सर्वधर्म सम्मेलन आदि उनकी धार्मिक गतिविधियों के अंग रहे। यहीं कारण है कि पूज्य गुरुदेव श्री कमलमुनिजी कमलेश सभी धर्मो मे आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखे जाते है।
आपके 66 वे जन्म दिवस के अवसर पर मैं अपनी शुभकामनाएं प्रगट करता हूं और वीर प्रभु महावीर से प्रार्थना करता हूं कि उन्हें दीर्घ आयु देवे और सदा स्वस्थ रखे।