दुनिया में सबको समझना आसन है लेकिन माँ को समझाना बहुत मुश्किल है – पूज्याश्री शतावधानी गुरु कीर्ति जी

रतलाम । देवता के पास इतना वैभव होता है की उनके पैर की एक जूती तराजू के पलड़े में एक और रख दी जाए और दूसरी और रख दी दुनिया की सारी दौलत एक तरफ रख दी जाए तो भी जूती वाला पलड़ा भारी रहेगा । भगवान महावीर के काल में एक धर्मात्मा सेठ था वो दान पुण्य करता रहता था, उसने एक सुंदर बावड़ी का निर्माण करवाया, बावड़ी की सुंदरता से उसे अभिमान आ गया और उस पर उसकी आसक्ति हो गई, इतनी आसक्ति से उसने अपना भव बिगाड़ लिया और मरकर उसी बावड़ी में मेंढक के रूप में तिर्यंच रूपी जन्म लेना पड़ा।
कुछ समय बाद भगवान उस नगरी में पधारे पनिहारीने बावड़ी के आसपास बाते करती है की भगवान पधारे है, मेंढक को यह सुनकर ध्यान लगाने पर जाति स्मरण ज्ञान होता है। और सोचता है ओह में अपनी आसक्ति की वजह से यँहा पँहुच गया हूँ । अब उसकी उत्कृष्ट भावना जग जाती है, बेले बेले की आराधना करता है, जो बहने कपड़े धोने आती है उस धोवन पानी से पारणा करता है।
गुनशीलक उद्यान में प्रभु पधारे है यह बात जब मेंढक को पता चलती है तो वह भी सोचता है की भगवान के दर्शन करने जाऊं, फुदक फुदक कर तालाब की सीढिय़ों को पार करके राजमार्ग से वो उद्यान की और जाता है, राजा श्रेणिक जो की भगवान का परम भक्त था वो भी उसी मार्ग से अपने लवाजमे के साथ जा रहा था, घोड़े के पांव के नीचे आने से वो मेंढक बुरी तरह से घायल हो जाता है तो एक तरफ जाकर अपने पापों की आलोचना करते हुए चौरासी लाख जीवों से क्षमायाचना करते हुए समतापूर्वक संथारा ग्रहण करता है, और आयुष्य पूर्ण करके पहले देवलोक में दुर्दांत नामक देव बनता है वँहा पंहुचकर उसे अवधि ज्ञान प्राप्त हो रहा है और भगवान महावीर के समवसरण में जाता है ।
पूज्याश्री शतावधानी गुरु कीर्ति ने फरमाया महावीर कथा को आगे बढ़ाते हुए फरमाया की जो व्यक्ति भगवान महावीर के 27 भव की कथा जीवन में एक न एक बार सुन लेता है तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आएगा। क्योंकि महावीर के हर भव में हम अपने आप को कँही न कँही महसुस कर सकते है।
मरीची की आंकाक्षा थी, शक्तिशाली बनने की, फिर युक्तिशाली बनने की आकांक्षा हुई, फिर अब वह चक्रवर्ती बनना चाहता है। मरीची के कुल में चक्रवर्ती और तीर्थंकर थे। तीर्थंकर स्वंय के पुरुषार्थ एंव पराक्रम से बनते है। मरीची चाहता है की मैं पिता की तरह चक्रवर्ती बन जाऊं, पूरी दुनिया मेरे कदमों में झुके ।
भरत एंव मरीची मरुदेवी माता के पास पँहुचे और कहा तेरा बेटा आदिनाथ अयोध्या में आ गया है। मरुदेवी कहती है जब मेरा बेटा अयोध्या में आ सकता है तो महल में क्यों नही ।
सौभाग्यशाली होते है वो बेटे, जिनकी माँ की नजर केवल अपने बेटे पर रहती है, दुनिया में सबको समझना आसन है लेकिन माँ को समझाना बहुत मुश्किल है , माँ को केवल जीया जा सकता है ।
भरत मरुदेवी माता से कहता है जँहा भगवान का समवसरण लगा है वँहा जाने के लिये मैने सारी तैयारियां कर ली है। तेरे लिये हाथी सजा दिया है, हाथी के हौदे पर बैठकर चल, औऱ अगर तेरा बेटा मान जाए तो उसे भी हाथी के हौदे पर बैठाकर वापस महल में ले आना। करेक्शन व क्रिएशन ये दो बातें जीवन में जुड़ी हुई है, माँ क्रिएशन करती है, पत्नि करेक्शन करती है और करेक्शन नही हो पाए तो रिएक्शन शुरू हो जाता है।
पुत्र सुपात्र हो या कुपात्र अच्छा हो या बुरा पूरी दुनिया पुत्र को छोड़ दे लेकिन माँ कभी पुत्र को नही छोड़ती है । एक हाथी के हौदे पर मरुदेवी माता और मरीची बैठा है, एक हाथी पर भरत चक्रवर्ती जुलूस के रूप में भगवान के समवसरण में जाते है।
तीर्थंकर का समवसरण ऐसा भव्य होता है, की अडानी, अम्बानी, टाटा, बिरला, एलन मस्क, बिल गेट्स दुनिया के सारे दौलतमंद लोग मिल जाए या पूरी दुनिया की दौलत मिल जाए तो भी उसकी भव्यता की अंश मात्र बराबरी नही कर सकते है। भव्य समवसरण लगा है, रत्नमणि से जडि़त सिंहासन पर आदिनाथ भगवन विराजमान है, सर पर छत्र, आजू बाजू चँवर, देव दुंदुभी लाखों की संख्या में मनुष्य, तिर्यंच, देवी देवता उन्हें निहार रहे है ।
मरीची की निगाह केवल एक बार प्रभु आदिनाथ की और जाती है लेकिन उसकी नजर लगातार उस वैभव को देख रही है। माँ केवल अपने बेटे को देख रही है लेकिन सामने बेटा नही परमात्मा तीर्थंकर विराजमान है, माता को तीर्थंकर से कोई मतलब नही है वो तो सिर्फ अपने बेटे को ढूंढ रही है, क्योंकि जब तक भगवान को केवलज्ञान हुआ था तब तक मरुदेवी को धर्म का बोध नही हुआ था ।
माँ ऋषभ ऋषभ कर रही है, पहले माँ एक बार आवाज लगाती थी तो ऋषभ दौड़ कर चला आता था, लेकिन अब तो वो तीर्थंकर बन चुके है, उनकी आँखें बन्द है उन्हें किसी से लेना देना नही है। हाथी के हौदे पर बैठी माँ बेटे की आँख खुलने का इंतजार कर रही है । क्या आदिनाथ भगवान माँ के पास आएंगे क्या होगा मरुदेवी माता का क्या होगा मरीचि का ये सब आगे प्रवचन में पता चलेगा ।
नवयुवक मंडल के महामंत्री रितेश मूणत ने बताया की संघ अध्यक्ष सुरेशजी कटारीया के पुत्र एंव पुत्रवधु अमित नेहा कटारिया के आज 14 उपवास की उग्र तपस्या चल रही है। 12 घण्टे जाप की श्रृंखला में आज के जाप सुजाननलजी बापूलालजी खमेसरा के निवास स्थान शास्त्री नगर पर रखे गए दिनाँक 27 जुलाई के जाप मदनलाल जी सुजानमल जी खमेसरा के निवास स्थान गुरु तेग बहादुर स्कूल के पीछे शास्त्री नगर पर रखे गए है।

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