माँ से बड़ा गुरू कोई नहीं है -तप चक्रेश्वरी अरुण प्रभा जी मसा

रतलाम । भारत देश में लाखों करोड़ो माताएँ पुत्रों को जन्म देती है, लेकिन हर माता ेेेेेेभाग्यशाली पुत्र को जन्म नही देती है। राम, कृष्ण, महावीर, तीर्थंकर, बलदेव, वासुदेव, महापुरुषों, आचार्यो को जन्म देने वाली आत्मा गिनी चुनी होती है। चिचोड़ी ग्राम में हुलसा माता ने नेमीचंद को जन्म दिया। माता धर्म संस्कार वाली थी, माता धर्म संस्कार वाली थी, माता जो संस्कार देती है वो सारे शिक्षक भी नही दे पाते है।
हुलसा माता नेमीचंद को लोरी सुनाती बड़ा होके तू नाम कमाना जग को सच्ची राह दिखाना। ऐसे शुभ संस्कारो से नेमीचंद की आत्मा सुशोभित होती है। आचार्य रत्नऋषि जी चिंचोड़ी गाँव में आते है। नेमीचंद को देखकर रत्नऋषि हुलसा माता से कहते है की यह बालक बड़ा होकर जीन शासन की बहुत प्रभावना करेगा, इसे जिनशासन को समर्पित कर दे। माता भी धर्मनिष्ठ थी, उसने रत्नऋषि के चरणों में नेमीचंद को समर्पित कर दिया।
मात्र 13 वर्ष की उम्र में दिक्षा हो गई, गुरु ने नाम दिया आँनन्द। माता के गर्भ में आए तो माँ को आँनन्द दिया, गुरु के चरणों में आए तो गुरु को आँनन्द दिया, बाद में पूरे संघ एंव समाज को आँनन्द दिया।
आपके गुरुजी ने आपको पढाने के लिये बहुत से विद्वानों की नियुकि करी । आपने भी खूब मन लगाकर अध्ययनन किया और प्राकृत, व्याकरण, शास्त्रों का गहन अध्ययन किया और सर्वश्रेष्ठ महारत प्राप्त की। आप लब्धि के भंडार थे, आपको वचन सिद्धि प्राप्त थी, आपके जीवन के कई चमत्कार लोगों ने साक्षत देखे है । अहमदनगर और पूरे महाराष्ट्र में जैन अजैन सब में आपको आँनन्द बाबा कहते है। आज भी अहमदनगर और चिचोड़ी तीर्थभूमि है। श्रमण संघ के द्वितीय पट्टधर आप बने।
हम जब महासती सत्यसाधना जी के साथ 2 दिन के लिये अहमदनगर उनके दर्शनार्थ गए । 2 दिन बाद महासती जी ने आचार्य सम्राट से कहा की मंगल पाठ श्रवण करवा दीजिये हमें पूना की और विहार करना है तो भगवन ने कहा अभी तो आप आए है कुछ ज्ञान ध्यान मैने आपने दिया नही है, मैं अभी आपको मंगलपाठ नही दूँगा, अभी कुछ समय रुको । दोपहर में आचार्य भगवन सन्त सतियों को सिखाते थे। जीनसाशन के ऐसे सरल और महान आचार्य की आज हम 122वीं जन्म जयन्ती मना रहे है। आप जँहा भी हो वँहा से हमें आशीर्वाद प्रदान करे एंव आपके एक दो गुण भी हमें मिल जाए तो हमारा जीवन धन्य हो जाए।
शतावधानी पूज्या श्री गुरु कीर्ति ने मेरे महावीर को जानों कथानक को आगे बढाते हुए फरमाया की चक्रवर्ती पद पर तभी बैठ सकते है जब चक्र तैयार हो जाए और बाकी सभी देशों के राजा और परिवार के लोग स्वीकृति प्रदान करे । च्रक का भी एक नियम होता है की वो परिवारजन के ऊपर कार्य नही करता है ।
सब ने स्वीकृति प्रदान कर दी परिवार ने भी स्वीकृति प्रदान कर दी लेकिन भाई बाहुबली ने आज्ञा प्रदान नही की। भरत और बाहुबली के बीच युद्ध हुआ, भरत ने चक्र छोड़ा वो बाहुबली की परिक्रमा करके लौट गया, बाहुबली भरत से युद्ध में भारी पड़ रहा था । इंद्र ने आकर बाहुबली से कहा भरत को मत मारो ये चक्रवर्ती बनेंगे बाहुबली ये युद्ध खत्म करके दिक्षा ग्रहण कर ली।
एक अष्टापद पक्षी आठ हाथियों को लेकर उड़ सकता है इतना बलशाली होता है, 20 लाख अष्टापद पक्षी जितना बल एक चक्रवर्ती में होता है। 10 लाख चक्रवर्ती का बल एक वासुदेव में होता है, 1 करोड़ देवता का बल 1 इंद्र में होता है और असंख्यात देवता का बल तीर्थंकर की छोटी उंगली में होता है।
प्रभु ने बताया था की मरिची की आत्मा आगे चलकर चक्रवर्ती बनेगी, वासुदेव बनेगी और तीर्थंकर बनेगी । भगवान के समवसरण से सभी बाहर आए और मरिची का अभिवादन करते है तो मरिची कहता है मेरा नही भगवान आदिनाथ का अभिवादन करो। जिन्होंने मुझ पर ये असीम कृपा की।
सभा में सभी चले गए केवल भरत चक्रवर्ती बचा, भरत के मन में कसक रह गई की मैं चक्रवर्ती हूँ और मुझे अपने बेटे को प्रणाम करना पड़ रहा है । नजर हटी दुर्घटना घटी, अब तक मरिची की नजरें नीची थी, लेकिन जैसे ही चक्रवर्ती के हाथों ने उसके पैर को छुआ भरत ये सोचकर झुकता है की भविष्य के तीर्थंकर को प्रणाम कर रहा हूं। अब तक मरिची की निगाह नीचे थी, लेकिन राजसी चरण स्पर्श को छूते ही मरिची के भीतर पुन: राजसी भावना आ गई। उसकी निगाह ऊपर उठती है, जो कनेक्शन अब तक प्रभु आदिनाथ से जुड़ा था वो अब चक्रवर्ती भरत से जुड़ गया। जँहा का कनेक्शन वँहा का करंट ।
मरिची के मन में अहंकार आ गया, वो सोचता है ये वो ही व्यक्ति है जो मुझे कभी लायक नही समझता था, आज वो मेरे पैरों में झुक रहा है।
भरत ने कहा मैं तुन्हें प्रणाम करता हूँ क्योंकि तुम भविष्य के तीर्थंकर बनने वाले हो। भरत की बात सुनकर मरिची के मन में अहंकार आ गया, आदिनाथ के मुख से यह बात सुनकर उसमें विनम्रता के भाव आए थे लेकिन भरत के मुख से वो ही बात सुनकर उसके भीतर अहंकार जाग गया।
वो घण्टो घण्टो तक तालियां बजाता है, कूदता है, नाचता है कहता है मेरे दादा प्रथम तीर्थंकर, मेरे पिता चक्रवर्ती, मैं स्वंय चक्रवर्ती, वासुदेव और तीर्थंकर बनूंगा, मेरा कुल कितना महान है।
ये मरिची के जीवन की दूसरी गलती थी पहली गलती थी भगवान से पूछे बिना अपना मार्ग चुना । दूसरा अपने कुल का अभिमान किया। आज का जैन भी अहंकार भी करता है नमस्कार भी करता है, महावीर की कथा सिर्फ महावीर से रिलेटेड नही है, आपसे भी रिलेटेड है, आप भी अहंकार करते हो, ईगो रखते हो । क्रोध दिख जाता है, मान माया दिख जाती है लेकिन स्वंय का अहंकार नही दिखता है । इस अहंकार का परिणाम मरिची को कँहा से कँहा ले जाता है ये आगे सुनने पर पता चलेगा।

Play sound