

रतलाम । इस संसार में सभी जीव जीना चाहते है, बेन्द्रीय से पंचेन्द्रीय सभी को जीवन प्रिय है। मृत्यु कोई पसन्द नही करता है, सभी को जीने का हक है।
हिंसा हमें भव भव भृमण करवाती है, अशांति देती है। अहिंसा हमें भव भव से छुटकारा दिलाती है, मोक्ष में प्रवेश दिलाती है, अहिंसा से सुख शांति मिलती है, संसार के सभी धर्मों में अहिंसा को ही महत्व दिया है। जैन धर्म में तो अहिंसा को माँ भगवती की उपमा दी गई है।
दया, करुणा, मैत्री, मानवता ये सभी अहिंसा के अंग है। भले ही हमें लगे की हम हिंसा नही करते है लेकिन हम अनजाने में ही बड़ी बड़ी हिंसा करते है, सिल्क के कपड़े बनने में चमड़े की वस्तुएं बनने में असंख्य जीवों की निर्दयतापूर्वक बहुत ही क्रूरतापुर्वक हिंसा होती है। आज से सभा में बैठे हुए सभी नियम लेवे की आज के बाद रेशम के कपड़े और चमड़े की वस्तुएं नही खरीदेंगे।
सागर न बन सको तो सरिता बनो, रवि न बन सको तो रश्मि बनो अरे श्रमण न बन सको तो श्रावक जरूर बनों। छोटे छोटे कदम धर्म की और बढ़ाए । अहिंसा परमोधर्मः सूत्र को जीवन में गाँठ बाँध है । नेमकुमार राजकुमार ने अपनी बारात में पंचेन्द्रीय जीवों का क्रंदन देखा और जब उन्हें पता चला की उनके विवाह में इन पशुओं का माँसाहारी भोजन बनाया जाएगा, उन्होंने बारात वापस लौटा दी और गिरनार पर्वत पर साधना करने लगे और तीर्थंकर नेमिनाथ बने।
आप शादी करते हो तो तोरण पर लगी चिड़िया को तलवार से मारते हो ये भी भाव हिंसा है।
शतावधानी गुरु कीर्तिजी म.सा. महावीर के प्रांगण में कस्तूर के आंगन में पर्युषण का वेलकम हो चुका है। पर्युषण पर्व चीफ गेस्ट की तरह पधार चुके है।
फूल है मगर सुगन्ध नही ये अच्छी बात नही, सरोवर है मगर पानी नही ये अच्छी बात नही, धन है मगर सुख नही ये अच्छी बात नही और धर्म स्थान पर बैठे हो और मुँह पर मूँहपत्ति नही ये अच्छी बात नही।
घर की दीवारों को रंगने का पर्व है दिवाली, चेहरे को रंगने का पर्व है होली और आत्मा को धर्म के रंग में रंगने का पर्व है पर्युषण।
पर्युषण के प्रथम 7 दिन तक हमें अपनी आत्मा की प्रूफ रीडिंग करना है और आंठवे यानि संवत्सरी के दिन शुद्ध आत्मा की बुक पब्लिश करना है।
आप पर्युषण क्यों मनाते हो मेरे परदादा मनाते थे, मेरे दादा मनाते थे, मेरे पापा मनाते थे तो मैं भी मनाता हुँ । सभा में हँसी का फव्वारा।
धर्म की शुरुआत काया से होती है, आप सबसे पहले काया के द्वारा ही धर्मस्थान पर जाते हो, जब आप बहुत छोटे थे तब आपके माता पिता आपको धर्म स्थान पर ले जाकर काया से गुरु भगवन्तों को नमन करना सिखाते है, काया के बाद वचन से हम धर्म करते है, नवकार मंत्र जाप आदि वचन से करते है, फिर मन से धर्म करते है उसके बाद आत्मा में धर्म बसता है ।
जबकि पाप की शुरुवात हम मन से करते है सबसे पहले मन में बुरा विचार आता है फिर वचन से गाली अपशब्द बोलकर पाप करते है और सबसे आखिर में काया से पाप करते है मारपीट, खून खराबा।
मतलब धर्म काया, वचन, मन और आत्मा की और ले जाती है और पाप मन से शुरू होकर काया की और ले जाता है। धार्मिक और धर्मात्मा में अंतर है, धार्मिक सब होते है लेकिन धर्मात्मा बहुत ही विरले होते है । धर्म-आत्मा जिसकी रग रग में जिसकी आत्मा में धर्म बसा हो वो धर्मात्मा होता है। ऐसा धार्मिक व्यक्ति किसी काम का नही जो धर्मस्थल पर आकर तो धर्म आराधना करे और घर पर दुकान पर जाकर सबसे क्लेश करे।
आपको धर्म का फल अभी चाहिए या बाद में इसी भव में चाहिए या अगले भव में – सभा में से आवाज आई अभी चाहिए इसी भव में चाहिए, मिल जाएगा लेकिन एक शर्त है पाप का फल भी अभी मिलेगा इसी भव में मिलेगा सभा में चुप्पी। धर्म को जानो धर्म की मानो धर्म किया जाता है, धर्म को जिया जाता है।
चर्चा चहकती है और चरित्र महकता है। धन की रेस में धर्म की प्रोग्रेस नही हो सकती है। थोड़ा करो लेकिन मन से करो दिखावे का धर्म मत करो ।
बाल मुनि गुरु निधि जी मसा ने कहा अहिंसा का छाता, सत्य की फुहार, ब्रह्मचर्य का खम्बा, दान की दिव्यता, शील की सुंदरता, भावों की भव्यता, तप की तेजस्वीता यही है पर्युषण की महत्ता।
भवों की गाँठ का आपरेशन करने वाला यह पर्युषण खास है, ईर्ष्या द्वेष का कचरा साफ करने वाला यह पर्युषण खास है, आई एम द बेस्ट का चश्मा उतारने आया है, बी केयरफुल कहने आया है, आत्मा को ग्रेसफुल बनाने आया है।
चातुर्मास काल में अब तक फ्रेंडशिप डे रक्षाबंधन, स्वतंत्रता दिवस और जन्माष्टमी आया है यह पर्युषण पर्व कहता है की फ्रेंडशिप करो धर्म से, जीवों की स्वतंत्रता हो, जीवों की रक्षा हो, जन्माष्टमी जीवों को सँवारना। अब तक जो खाना है खाया, जो पीना था पिया अब जियो आत्मा के लिए, बहुत किया अतिक्रमण अब कर लो प्रतिक्रमण, राखी पर बहुत खाई मिठाई, अब करो अठाई, इडली खाई खाया डोसा अब तो कर लो पोषा।
पर्युषण पर्व में परोपकार, प्रार्थना, पुण्य और प्रवचन करना है और पाप छोड़ना है