रतलाम। धन की गति तीन है – दान , भोग, और नाश दान – भोग में ना लगे तो निश्चय होवे विनाश। देने वालों की भावना कैसी होनी चाहिए – श्रेष्ठ और लेने वाले को क्या होना चाहिए- संतोष। दान कैसे दिया जाता है। दान दो प्रकार के होते है, जैसे नाव दो प्रकार की होती है – लकडी की व पत्थर की। लकडी की नाव तिरा देती है और पत्थर की नाव डूबा देती है। पत्थर की नाव में बैठने वाली नागश्री ब्राह्ममणी धर्मरुचि अणगार को कडवे तुम्बे का साग वहराया। दान तो दिया परन्तु पत्थर की नाव में बैठकर ,वह तो डूबाने वाला ही है। धर्मरुचि अणगार ने तो संसार परिस्त कर लिया परन्तु नागश्री ब्राह्ममणी ने संसार बढा लिया। दान के दूषण क्या है ? दान के दूषण बताए है पहला अनादर करके देना, दुसरा विलम्ब करके दान देेना, तीसरा अप्रिय वचन बोलकर दान देना ,चौथा दान देकर के पश्चाताप करना।
उक्त उद्गार साध्वी प्रवीणाश्रीजी ने श्री धर्मदास जैन मित्रमण्डल नौलाईपुरा स्थानक पर पर्युषण पर्व के दुसरे दिन आयोजित विशाल धर्मसभा में व्यक्त किए। आपने कहा कि पैसा आज है कल नही , क्या ग्यारण्टी है कि यह टिकेगा ,परन्तु महत्व किसको देते है? पैसे को। कहते है- दादा बडा न भैय्या सबसे बडा रूपैया। ज्ञानी पुरूष कहते है सुपुत हो तो क्यों धन संचय और कुपुत हो तो क्यों धन संचय। अर्थात् सुपुत्र होगा तो वह स्वयं कमा लेगा और कुपुत्र होगा तो वह व्यसनों में धन उडा देगा। दान में पैसे लिखवा दिए संघ वाले लेने आए तो कहते है आज नही कल दूंगा ,विलम्ब कर दिया तो चक्रवर्ती ब्याज चालू हो गया। डाकू ले जाता है ,वह नही ले जाए तो डॉक्टर ले जाता है ,दोनों की एक ही राशि है। डॉक्टर नही ले जाए तो इनकम टैक्स ऑफिसर ले जाएगा ,वहॉ फिर गुप्त दान देते है पेपर में नाम नही आए और संघ में दान दिया और संचालक महोदय ने नाम नही लिया तो भडक जाते है। यह पैसा आज नही तो कल, कल नही तो परसों चुकाना ही पडेगा नही तो ।ठब्क् में आना पडेगा अर्थात् ।. अटैक , ठ.ब्लडप्रेशर, ब्.केंसर , क्. डायबिटिज। कोई घर पर मॉगने आया , अनुकम्पा दान नही दिया ,अप्रियवचन बोलकर दान दिया ,ऐसा करके जीव संसार बढा लेता है। दान में पक्षपात नही होना चाहिए। सुपात्रदान के लिए घर के द्वार हमेशा खुले होने चाहिए। हमारे घर पर पंच महाव्रतधारी कोई भी आ जाए किसी के साथ पक्षपात नही करना , जो सुस्ता हो वह वहराना ,अपने- परायें का भाव नही रखना। दान कहा देना- जहॉ हमारे पैो का सदुपयोग हो। दान देने के बाद प्श्चाताप नही करना। मम्मण सेठ ने दान देकर पश्चाताप किया। पूर्व भव में तो इस भव में 56 करोड की सम्पति होकर भी सुखा की सुखा। कहते है – जो जोड गया – सिर फोड गया, गाढ गया- झक मार गया , खाय गया – खो गया , दे गया- जोड गया। दान देने में भी विवके होना चाहिए। भरे हुए को भरते है – पार्टी दो तो किसको देते है दान देना हो तो कहते है – दादाजी से पूछना पडेगा।
”बातालों हमेशा बाता ही बनावे, कोरी बात से कई हाथ आवे
और कोई बात दादीजी से पूछेज कोनी, परन्तु दान देती समय दादीजी ही याद आवे।”
यहॉ दिया दान परलोक में जमा हो रहा है। अनुकम्पादान देना है। साधर्मी की सहायता करो। यह पैसा आज है कल नही होगा। संसार में आए है, क्या लाए थे, क्या ले जाना है। हमारे घर के द्वार साधु संतो के लिए, दीन – दुखियों के लिए हमेशा खुले रहना चाहिए। इस भव में न देंगे तो अगले भव में टन टन पाल मदन गोपाल। शुभ भावों से दान देना है।
साध्वी हर्षिताजी ने अन्तगडदसा सूत्र का वांचन किया।
गुरूवार को साध्वी प्रवीणाश्रीजी के मुखारविन्द से हर्ष मेहता ने 25 उपवास , किरण मुणत , आर्ची रांका , लोकेश मेहता व खुशी माण्डोत ने 24-24 उपवास , मास्टर संयम पटवा ने 19 उपवास व कुन्दनमल बांठिया ने 15 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। वही बडी संख्या में आराधको ने बेला दो उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। संचालन अणु मित्रमण्डल के सचिव सौरभ कोठारी ने किया। प्रभावना का लाभ श्री धर्मदास जैन श्री संघ ने लिया। दोपहर में कल्पसूत्र का वांचन व धार्मिक प्रतियोगिता का आयोजन हुआ।
शुक्रवार को मनाया जाएगा पक्खी पर्व
साध्वी मण्डल के सानिध्य में शुक्रवार को पक्खी पर्व जप – तप -त्याग तपस्या व विविध आराधनाओं के साथ मनाया जाएगा। श्रावक – श्राविकाए उपवास सहित कई आराधनाए करेंगें।