जैन दिवाकर वाणी – आत्मा की खेती

साभार : जैन दिवाकर ज्योतिपुंज खंड 2/ 326 प्रवचानांश : पू.श्रीचौथमलजी म.सा.
प्रस्तुति : सुरेन्द्र मारू, इंदौर

भगवान की भक्ति करना भी एक प्रकार की खेती करना ही है। इससे आत्मा की खुराक तैयार होती है– आत्मा को भोजन मिलता है। अतः इस खेती को बोने से पहले भी बीज और खेत की परीक्षा कर लेना चाहिए। भगवान की भक्ति रूपी खेती के लिए हृदय रूपी खेत उपजाऊ होना चाहिए. उसमें लालसा, राग -द्वेष,विकार आदि के विषैले कीड़े या पत्थर -कंकर नहीं होने चाहिए। यह सब हुए तो वे बोये हुए बीज की शक्ति को नष्ट कर देते हैं। परिणाम स्वरूप बीज उगता नहीं है। तब लोग कहने लगते हैं कि भक्तिरूपी बीज तो उगता ही नहीं है। वे यह नहीं सोचते कि इसमें बीज का दोष नहीं, भूमि का ही दोष है। इसके विपरीत जो हृदय रूपी खेत को साफ-सुथरा करके निर्दोष बनाकर, पवित्र भावना के साथ भगवान की भक्ति करते हैं, उन्हें कभी निष्फलता नहीं मिलती। उन्हें तत्काल ही फल प्राप्त हो जाता है।पेट कीखेती करने वाले को तो समय आने पर फल मिलता है मगर आत्मा की खेती करने वाला तत्काल ही फल प्राप्त कर लेता है।