राग दरबारी – व्यंग

प्रो.डी.के. शर्मा
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राग दरबारी एक सास्वत सत्य है। यह एक ऐसी विधा है जिसका उपयोग अन्नत काल से होता आ रहा है। व्यक्तिगत हित साधन का राग दरबारी अनुपम अस्त्र है। इसका प्रभाव इसका उपयोग करने वाले की क्षमता पर निर्भर करता है। इसका उपयोग करने वाला व्यक्ति जितना चतुर और चालाक होगा उतना ही प्रभावी असर उस व्यक्ति के राग दरबारी का होगा। यह एक ऐसा अस्त्र है जिसका उपयोग चतुर चालाक चमचे अपने हित साधने के लिए अनन्तकाल से करते आ रहे हैं। इसका उपयोग करके एक चालाक व्यक्ति अपने से अधिक चालाक व्यक्ति को मूर्ख बनाने का प्रयास करता हैं।
इस मुहावरे से हमारा परिचय श्री लाल ‘ाुक्ल ने उनकी लोकप्रिय कृति राग दरबारी से करवाया। उनकी इसी नाम की कृति ‘राग दरबारी‘ ने इस अनुपम विधा पर विचार करने को प्ररित किया। हमारा तात्पर्य समाज में व्याप्त चमचागिरी से है। आज कल लोग अपना काम करवाने के लिए सम्बन्धित व्यक्ति की खुशामद करते है। खुशामद करने वाला अधिकार प्राप्त व्यक्ति के ऐसे गुणों को ढूंढ निकालता है जिनकी कल्पना उस व्यक्ति ने स्वयं भी कभी नहीं की होगी। हमारे आकलंन के अनुसार राग दरबारी के अनेक स्वरूप है। प्रयास करते है राग दरबारी के उन स्वरूप का जो वर्तमान में प्रभावी रूप से प्रचलित है। प्रत्येक क्षेत्र का राग दरबारी अलग अलग होता है। दरबारी वास्तव में एक व्यक्ति को प्रसन्न करके हित साधने की अनुपम कला है।
प्रारम्भ करते है सत्ता के गलियारे से जिसे सब राजनीति कहते है। इसे नीति कहना ही गलत है क्योंकि इसमें नीति छोड़कर सब कुछ हैं। सत्ता प्राप्त करने की अनीति ही यहां नीति कहलाती है। इस अनीतिपूर्ण खेल में चमचागिरी ही राग दरबारी कहलाती है। पार्षद पंच बनने से उपर तक पहुंचने की प्रक्रिया ही राग दरबारी है। इसका उपयोग करके ही सत्ता की अगली सीढ़ी तक पहुचने का प्रयास व्यक्ति करता है। प्रत्येक व्यक्ति की राग दरबारी खेलने की क्षमता अलग अलग होती है। जो जितनी बेशर्मी से यह खेल खेलता है वह उतना लाभ प्राप्त कर लेता है। एक बार सत्ता सध गई तो बाकी सब प्राप्त हो जाता है। एक साधे सब सधे।
राग दरबारी का एक और प्रकार होता है। उपर वाला जो कह दे उसको निरंतर बोलते रहना। आज कल इसके अनेक प्रकार सभी राजनैतिक दलों में दिखाई देते हैं। नौकरी ना मागों,ठेला लगाओ। पच्चीस, तीस साल की नौकरी की जगह चार साल की नौकरी करो। पेंशन मांगना अपराध है। हम पेंशन लेंगे,तुम्हें नहीं देंगे। नीचे तक यही राग लापा जाता हैं।
जो दल सत्ता में नहीं है उनमें भी बॉस ही सब कुछ है। देश में प्रजातंत्र समाप्त हो गया है। यही पाठ राग दरबारी बन जाता है। आमजन की भावना और विचारों से किसी का कुछ लेना देना नहीं। हमारे नेता जो कह दे वही सही है। जो व्यक्ति इस राग को अलापने में जितना माहिर होगा वह उपर की सीढ़ियां चढ़ने में उतना ही सफल होगा विचारों की स्वतंत्रता कहने भर को होती है। पंसद तो सब राग दरबारी ही करते हैं। छोटी छोटी बातो के लिए भी सबको राग दरबारी ही गाना पड़ता है। सूत्र एक ही है- राग दरबारी गाओ और मलाई खाओं।

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