मानवाधिकारों के प्रणेता भगवान महावीर

डॉ. दिलीप धींग (जैन), चैन्नई

प्राचीन समय से ही विविध प्रकार की सेवाएं करने वाले व्यक्ति राजा और अन्य सम्पन्न घरानों में नौकरी करते रहे । जैन संस्कृतिऔर सिद्धांतो का यह सुप्रभाव रहा कि नौकरों और दास-दासियों पर होने वाले अत्याचारों के विरूद्ध वातावरण बना । अनुकूल वातावरण में अनेक साधारम व्यक्तियों नेअसाधारण को ऊंचाईयाँ प्राप्त की ।
वर्धमान महावीर के पिता राजा सिद्धार्थ और उनका परिवार भगवान पाश्र्वनाथ का उपासक परिवार था । सिद्धार्थ को जब वर्धमान के जन्म की सूचना मिली तो सूचना देने वाली दासी प्रियवंदा को उन्होंने दास-कर्म सेमुक्त कर दिया था भगवान महावीर के अन्यय भक्त राजा श्रेणिक नेभी उनके पुनजन्म का संवाद देने वाली दासी को दासत्व से मुक्त कर दिया था।
जैन ग्रंथ व्यवहार भाष्य के अनुसार एक परिवार के मुखिया ने उसकी दासी की सेवाओं से प्रसन्न होकर उसका मस्तक धोकर उसे दासता से मुक्त कर दिया था। एक बार एक गृहस्वामी उसके घर में दास को पीट रहा था । कुममारावस्था में वर्धमान उस घर के बाहर से जा रहे थे। मानव द्वारा मानव पर हुए इस अत्याचार से वर्धमान का दिल दहल उठा । उनका वैराग्य प्रबलतम हो गया । उन्होंने समाज से इन अत्याचारों को मिटाने का संकल्प किया ।
भगवान महावीर के द्वारा चन्दनबाला का उद्धार दास-प्रथा और नारी जाती के साथ हो रहे भेदभाव के विरूद्ध उनकी आध्यात्मिक क्रांति का बहुत बड़ा ऐतिहासिक उदाहरण है । भगवान महावीर के उपदेशों में ये स्वर आज भी गूंजते है कि मानव-मानव पर कोई अत्याचार नहीं करें, मानव किसी प्राणी पर भी कोई अत्याचार नहीं करें ।
जैन धर्म और दर्शन आत्मवाद पर खड़ा है । वहां मानववाद, मानवता और मानवीयता का अनुपालन सहज नहीं उत्कृष्ट रूप में हुआ । पूर्ववर्ती तैबीस तीर्थकरों की भाँति अंतिम तीर्थंकर महावीर ने भी मानवीयता एकता और सामाजिक एकता की अलख जगाई । उन्होंने मनुष्य को देवता से भी अधिक महत्व दिया मनुष्य को ही तीर्थ की संझा दी । उन्होंने अपने चतुर्विध संघ में सभी वर्णो, वर्गों और जातियों के व्यक्तियों को आत्म साधना के लिए समान अवसर प्रदान किए । आचार्य भद्रबाहु ने आचारांग नियुक्ति मेंमानवीय एकता और मानवीय गरिमा के स्वर को दोहराते हुए कहा – ”एक मणुस्स जाईÓÓ सम्पूर्ण मनुष्य जाति एक है। जैन आगम, साहित्य और इतिहास में मानव और मानवता को महिमान्वित करने वाले अगणित उद्धरण को उदाहरण मिलते है । उस समय आज की भांति उद्योग नहीं थे। इसलिए कोई औद्योगिक श्रम कानून और श्रमिक संगठन जैसे बात नहीं थी। न ही किसी मानवाधिकार संगठन या आयोग की जरूरत थी । कई बार लगता है मौजूदा व्यवस्थाओं में एक अन्तदृष्टि और मनुष्यत्व के दर्शन का अभाव है । क्योंकि यह सब होते हुए भी समस्याएं अनेक रूपों में हमारे सामने उपस्थित हो रही है ।
तत्कालीन समय में परिस्थितियों के अनुसार अन्य अनेक प्रकार की समस्याएं थी । व्यक्ति- परिष्कार और हृदय- परिवर्तन से उन समस्याओं का प्रभावशील समाधान भगवान महावीर और उनके अनुयायी कर रहे थे। निम्न जाति के समझे जाने वाले हरिकेशी और कई लोगों को मारने वाले अर्जुन मालाकार ने भगवान महावीर की शरण ग्रहण की, अपना जीवन रूपान्तरित किया और परमेष्ठी पद पाया । उनका सुस्पष्ट मंतव्य था – घृणा पाप से हो, पापी से नहीं ।
भगवान महावीर के प्रभाव से लोग मानवाधिकारों और मानवीय मूल्यों का सम्मान करने लगे थे। वस्तुत: भगवान महावीर तो प्रणिमात्र के अधिकारों की रक्षा के मौलिक उपदेशक थे। फलत: उनके उपदेश पथ पर चलने वाले प्राणीमात्र के अधिकारों के प्रति सजग बने । यही वजह है कि भगवान महावीर के दर्शन के परिपे्रेक्ष्य में मानवाधिकारों की व्याख्या सतही न होकर मानवीयता की अतल गहराईयाँ स्पर्श करती है । फलत: समता और अहिंसा दर्शन की निष्पश्रि स्वरूप हम भगवान महावीर को दास प्रथा मुक्ति के सूत्रधार और मानवाधिकारों की रक्षा के प्रणेता और प्रवक्ता के रूप में पातेहै । उनके जियो और जीने दो के उद्घोष का समानजशास्त्र, अर्थशास्त्र और पर्यावरण की दृष्टि से अत्याधिक महत्व है ।

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