संसार में सुख नहीं लेकिन संयम में सुख है – आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा.

रतलाम, 5 जुलाई। आचार्य श्री विजय कुलबोधी सूरीश्वरजी म.सा. ने बुधवार को प्रवचन में कहा कि जहां तक हमारा चित्त वासनाओं से घिरा रहेगा, वहां तक हमारा मन अशांति से घिरा रहेगा। वासना सांसारिक सुख होती है और भावना शुभ विचारों की स्थिरता ला सकती है। भावना में वासना के बल को तोड़ने की ताकत है। संसार में भले ही सुख नहीं लेकिन संयम में सुख है।
मोहन टाॅकीज में आयोजित प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने प्राप्ती और पात्रता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विज्ञान प्राप्ती को देखता है, धर्म पात्रता को देखता है। सांप के मुंह में दूध डालोंगे तब भी जहर बनेगा, जबकि गाय घांस खाती है और दूध बनाती है, जो अमृत के समान होता है। साधु-संत को पहले पात्रता मिलती है, फिर उन्हे ईश्वर की प्राप्ती होती है। प्रवचन सुनने की पात्रता चित, मन, वचन का मौन होना है।
आचार्य श्री ने कहा कि जो जिसका अधिकारी है अगर वह चीज उसे मिलेगी तो उससे सफलता प्राप्त होगी और जो अधिकारी नहीं है और उसे मिल गई तब विफलता मिलेगी। जामन को दूध में डालने पर ही दही बनेगा और पानी में डालेंगे तब वह पानी होगा। बारिश का पानी सीधे मुंह में जाएगा तो बीमारी होगी। नदी में जाएगा तो अमृत बनेगा, समुद्र में जाने पर खारा होगा। पानी की तासिर अलग-अलग है इसलिए वह हर जगह अलग मायने रखता है। इस अवसर पर श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी रतलाम के पदाधिकारी एवं श्रावक-श्राविकाएंगण उपस्थित रहे।