- घर में रहने से कर्म बंध जबकि स्थानक में जाने पर कर्म निर्जरा-दर्शनप्रभाजी म.सा.
- रूप रजत विहार में नियमित चातुर्मासिक प्रवचनमाला

भीलवाड़ा 8 जुलाई (निलेश कांठेड़)। जैन स्थानक केवल प्रवचन सुनने की जगह नहीं बल्कि संस्कारों से जोड़ आध्यात्मिक मार्ग पर ले जाने वाली पाठशाला है। बाकी स्कूल तो भौतिक जीवन से जोड़ती है लेकिन बच्चों को यदि संस्कारों से जोड़ना है तो उन्हें समय मिलते ही स्थानक अवश्य लेकर आए। माता-पिता जैसे होंगे वैसे ही बच्चों के संस्कार होंगे। यदि आज माता-पिता बच्चों को धर्म से नहीं जोड़ेंगे तो वृद्धावस्था में वह भी उनके धर्म सहायक नहीं बनेगा। ये विचार शहर के चन्द्रशेखर आजादनगर स्थित स्थानक रूप रजत विहार में शनिवार को नियमित चातुर्मासिक प्रवचनमाला में मरूधरा मणि महासाध्वी श्रीजैनमतिजी म.सा. की सुशिष्या मरूधरा ज्योति महासाध्वी इन्दुप्रभाजी म.सा. ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बच्चों को सप्त कुव्यसनों से बचाने के लिए संस्कारों की पाठशाला से जोड़ना ही होगा। छोटे बच्चों को संस्कार पाठशाला रूपी स्थानक के लिए माता-पिता को ही प्रेरित करना होगा। साध्वीश्री ने धर्म के संस्कार जीवन में मजबूत करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि चातुर्मास का लाभ नहीं लिया तो बाद में पछतावा करने पर भी बीता हुआ समय लौटकर नहीं आएगा। चातुर्मास में हर रविवार को सभी को कम से कम दो-दो सामायिक करने का लक्ष्य रखना है। धर्मसभा में मधुर व्याख्यानी डॉ. दर्शनप्रभाजी म.सा. ने धर्म एवं कर्म में अंतर बताते हुए कहा कि कर्म संसार की तरफ खींचता है और संग्रह की प्रवृति पैदा करता है जबकि धर्म आध्यात्मक से जोड़ अपरिग्रह की प्रवृति उत्पन्न करता है। हम बाहरी वातावरण से ध्यान हटा आत्मकल्याण पर ध्यान देना होगा। घर में रहने से कर्म बंध होता है जबकि स्थानक में जाने पर कर्म निर्जरा उत्पन्न होती है। स्वार्थी बनने की बजाय परमार्थी बनने का लक्ष्य रखे। बच्चों को धर्म से जोड़ने की सीख देते हुए कहा कि कई आत्माएं आज घरों पर बैठी है लेकिन उन्हें स्थानक छोड़ने वाला कोई नहीं होता। कॅरियर के नाम पर हम बच्चों को धर्म से जोड़ने में रूचि नहीं लेेकर गुडलक को बैडलक में बदल रहे है। साध्वीश्री ने कहा कि छोटे से छोटा नियम-त्याग हमारी आत्मा का कल्याण करेगा।
आत्मकल्याण की राह में सबसे बड़ी बाधा क्रोध
धर्मसभा में तत्वचिंतिका डॉ. समीक्षाप्रभाजी म.सा. ने क्रोध से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि क्रोध आने पर विवेक शून्य हो जाता है। क्रोध आत्मकल्याण की राह में सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने कहा कि परमात्मा से केवल मांगों मत दुर्लभ मनुष्य जीवन देने के लिए उसे धन्यवाद भी देना चाहिए। जैसा हम देंगे वैसा हमे मिलेगा। सुख से सुख, दुःख से दुःख और अंधेरे से अंधेरे की प्राप्ति होती है। हम कीमत खुद समझेंगे तो अन्य लोग भी समझेंगे। सृष्टि में छह काय के जीव नहीं होते तो हमारा जीवन जीना भी मुश्किल हो जाता। धर्मसभा में आगममर्मज्ञ चेतनाश्रीजी म.सा., आदर्श सेवाभावी दीप्तिप्रभाजी म.सा. एवं नवदीक्षिता हिरलप्रभाजी म.सा. का भी सानिध्य मिला। धर्मसभा में उपवास, आयम्बिल व एकासन तप के प्रत्याख्यान भी लिए गए। संचालन श्रीसंघ के मंत्री सुरेन्द्र चौरड़िया ने किया। चातुर्मासिक नियमित प्रवचन प्रतिदिन सुबह 8.45 बजे से 10 बजे तक होंगे।
कल सुबह युवाओं के साथ धर्मचर्चा एवं दोपहर में बाल संस्कार कक्षा
महासाध्वी इन्दुप्रभाजी म.सा. ने बताया कि सोमवार को अष्टमी से पचरंगी एकासन की आराधना भी शुरू हो रही है। इसके तहत पांच-पांच श्राविकाएं 5,4,3,2 एवं 1 एकासन करेंगी। इस आराधना के तहत 25 श्राविकाओं द्वारा कुल 75 एकासन होंगे। श्री अरिहन्त विकास समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र सुकलेचा के अनुसार रूप रजत विहार में प्रत्येक रविवार प्रातः 8 से 8.30 बजे तक युवाओं के साथ धमचर्चा का आयोजन होगा। इसमें युवा अपने मन की जिज्ञासाओं का पूज्य साध्वीवृन्द से समाधान कर सकेंगे। इसी तरह रविवार दोपहर 1 से 2 बजे तक बाल संस्कार कक्षा एवं दोपहर 3 से 3.40 बजे तक प्रश्नमंच का आयोजन होगा। चातुर्मास के तहत प्रतिदिन सूर्योदय के समय प्रार्थना का आयोजन हो रहा है। प्रतिदिन दोपहर 2 से 3 बजे तक नवकार महामंत्र जाप एवं दोपहर 3 से 4 बजे तक साध्वीवृन्द के सानिध्य में धार्मिक चर्चा हो रही है।