तपस्वी श्री दिलीपमुनिजी के सानिध्य में श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल नौलाईपुरा स्थानक पर 10 से अधिक तपस्‍वी मासक्षमण की ओर गतिमान

तपस्याओें का मानो लग गया मेला

रतलाम। आपको महान बनना है कि बुद्धिमान ? या दोनों बनना है ? महान बनने के दो उपाय – सामने वाला कड़वा वचन बोल रहा है तो उसका उत्तर मीठा देना और क्रोध आ रहा है तो चुप हो जाना। बुद्धिमान बनने के भी दो नुस्के – थोड़ा पढ़ना, ज्यादा सोचना और थोड़ा बोलो और अधिक सुनों। महान व बुद्धिमान बनना है तो ये छोटी छोटी बातें जीवन में उतारने जैसी है, प्रेक्टिकली करने जैसी है। जो गुण अपने जीवन में नहीं है, उसे जीवन में लाना है। उक्त उद़गार आचार्यश्री उमेशमुनिजी के शिष्य प्रवर्तकश्री जिनेंद्रमुनिजी के आज्ञानुवर्ती तपस्वीश्री दिलीपमुनिजी ने श्री धर्मदास जैन मित्र नौलाईपुरा स्थानक पर नियमित चल रही धर्मसभा के दौरान व्यक्त किए।
भगवान तीन ज्ञान गर्भ से ही लेकर आते है
तपस्वीश्रीजी ने कहा कि भगवान तीन ज्ञान तो गर्भ से लेकर आते है अर्थात बुद्धिमान तो गर्भ से ही थे तथा महान, साधना व पुरुषार्थ से बने, सारी परिस्थितियों को स्वीकार किया। सारे उपसर्गो को समभाव से सहन किया। भगवान की आत्मा कितनी पुण्यवान फिर भी कर्मो ने उन्हें नहीं छोड़ा। जो भी कर्म हमारे उदय में आ रहे है सोचना वह पूर्व भवों की ही खेती है। भगवान को दीक्षा लेते ही चौथा ज्ञान मन पर्यव ज्ञान हुआ। फिर साढ़े 12 साल 15 दिन की मोन साधना, सारे उपसर्ग को समभावों से सहन करते हुए केवलज्ञान प्राप्त किया फिर देशना दी। भगवान घर में रहते हुए सुखी थे कि दीक्षा ली उसके बाद सुखी हुए ? वे चरम शरीरी जीव थे, जानते थे जब तक संयम स्वीकार नहीं करूंगा तब तक शाश्वत सुख प्राप्त होने वाला नहीं है।
विनय का लक्षण नहीं तब तक साधना शुरू नहीं
भगवान की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र 16 प्रहर तक चली। इसका पहला अध्ययन विनय नाम का, जब तक जीवन में विनय नाम का लक्षण नहीं आता, तब तक साधना शुरू नहीं होती है। उत्तराध्ययन के तीन अर्थ – भगवान द्वारा पहले फरमाया फिर गणधर भगवान द्वारा गुंथित किया गया। 36 प्रधान अध्ययन, जो साधक को साधना में सहयोगी बने। 36 तार वाला विशाल छाता, जिसके अन्दर भवी जीव आराधना करने के लिए आ जाए, फिर उसका साधना मार्ग आगे बढ़ता जाता है। उत्तराध्ययन सूत्र में भगवान ने साधक की साधना के सारे उपाय, मार्ग बताए है।
भगवान ने सम्यक पराक्रम करना बताया
धर्मसभा में रविमुनिजी ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र 29 वां अध्ययन “सम्यक पराक्रम“ इस अध्ययन में भगवान ने बड़े ही सरल, सुन्दर शब्दों में साधना के रहस्यों को खोला है। भगवान जानते है कि जीव पराक्रम तो करता है परन्तु कौन सा ? मिथ्या पराक्रम ? नहीं, इसलिए भगवान ने सम्यक पराक्रम करना बताया है। जिनवाणी सभी चिन्ताओं से मुक्त कराने वाली है। जिनवाणी सुनने का मौका हमें मिला है, हमारी अनन्त पुण्यवानी का उदय है, इसे कैच करना है। तथा पुरुषार्थ करना है तथा अंतिम समय तक आराधना करना है। साधुपना मुश्किल क्यों ? क्योंकि इसमें पुण्य को फेंकना होता है किन्तु संसारी जीव पाप फल को फेंकना चाहता है। धर्म से हारने का सबसे पहला कारण – तत्वज्ञान का अभाव। धर्म करते हुए भी जीव तत्वज्ञान के अभाव में धर्म से हार जाता है। जिनवाणी सुनना है परन्तु कैसी ?- चटपटी ! यह बात बहुत अटपटी लगती है। यह जिनवाणी न तो मीठी है, न खट्टी, न कड़वी, न कषैली। यह तो एकदम सीधी व सरल है।
सामायिक की विधि घर से यतना पूर्वक आने से होती है शुरू
मुनिश्रीजी ने आगे कहा कि संसार अर्थात बास मारता बड़ा नाला, इसमें क्षणिक आनन्द भी नहीं है। फिर भी इसमें सुख मानकर बैठे है। चौमासे को नहीं जीवन को सफल करना है, जीवन को बदलना है, जीवन की दशा सुधारना है, आराधना करना है। जीवन में परिवर्तन करना है। सिर्फ चातुर्मास में ही नहीं प्रतिदिन स्थानक आकर आराधना करना है। वह आराधना कैसे हो ? आज्ञायुक्त भगवान की आज्ञा में आराधना करना है। उपयोग धर्म का लक्षण है। किसी भी साधक से खुले मुँह बात नहीं करना, यह विवेक होना चाहिए। सामायिक की विधि क्या ? सामायिक की विधि नवकार मंत्र से नहीं घर से यतना पूर्वक आने से शुरु हो जाती है।
तप आराधनाओं की लगी झड़ी, लिए प्रत्याख्यान
धर्मसभा में अणु श्राविका मण्डल की अध्यक्ष रीता झामर ने 27 उपवास, टीना गांधी ने 24 उपवास, सुरेश वोरा व गुप्त तपस्वी ने 23 – 23 उपवास, श्रेयांस चौरड़िया व विजय चतुर ने 22 – 22 उपवास, कमल मेहता, सचिन मांडोत, अंगुरबाला वागरेचा व गुप्त तपस्वी ने 21 – 21 उपवास, प्रेमलता मेहता ने 17 उपवास सहित कई गुप्त तपस्वी ने विविध तप के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। संचालन राजेश कोठारी ने किया।