रचयिता : अशोक मुनि जी
प्रस्तुति : सुरेन्द्र मारू, इंदौर
साभार: चौथमल जन्म शताब्दी अंक / तीर्थंकर नव. दिस. 1977


संवत 2001 में पूज्य गुरुदेव जैन दिवाकर जी का चातुर्मास उज्जैन हो रहा था उस समय का यह प्रसंग है।एक छोटा सा अबोध बालक जो करीब 4-5 वर्ष का ही होगा, उनके दर्शनार्थ आया। गुरुदेव ने कहा – तुम्हारा नाम क्या है? तुम क्या पढ़ते हो? वह उसी समय वहां से उठा और अपनी किताब लेकर आ गया । गुरुदेव ने- पूछा यह क्या है ? तब उसे बालक ने सहज निडर भाव सेकहा कि-यह अक्षर ज्ञान की किताब है। गुरुदेव ने पूछा – तुम इसे पढ़ना जानते हो?हां -कहने पर गुरुदेव ने उसे पढ़कर सुनाने को कहा। वह बालक अपनी तोतली बोली में पढ़ने लगा। पहला ही पाठ था – अकड़ कर मत चल, नम कर रह। यह सुनकर गुरुदेव समझाने लगे – है तो यह अक्षर ज्ञान, पर इसमें कितना महान अर्थ छिपा हुआ है ।
उत्तराध्ययन के प्रथम अध्याय का पूर्ण चित्र इसमें चित्रित है। इसमें भगवान ने विनय को महत्व दिया है । मानव का कल्याण अकड़कर चलने में नहीं, अपितु नम्रता के भावों से ही संभव है। उस दिन तत्व-चर्चा का यही विषय बना रहा ।गुरुदेव ने – अक्षर ज्ञान को अध्यात्म का प्रतीक बतलाया ।अक्षर ज्ञान में जो प्रथम अक्षर है वह अरिहंत का ही सूचक है, द्वितीय आचार्य का। मानव को इस पर बार-बार विचार करना चाहिए। ये विचार ही आत्म कल्याण के साधन है।