छोटूभाई की बगीची में प्रवचन
रतलाम,27 जुलाई। खराबी, मलीनता की पर्यायवाची है। तन की खराबी रोग लाती है, मन की खराबी संकलेश लाती है, जबकि जीवन की खराबी भय और चिंता देती है। इन सारे रोगों से मुक्ति का एक ही उपाय साधना है। साधना से तन के रोग, मन के संकलेश और जीवन के भय, चिंता सब दूर हो जाते है।
यह बात पूज्य प्रज्ञा निधि युगपुरूष आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। गुरूवार को छोटू भाई की बगीची में प्रवचन दौरान उन्होंने कहा कि खराबी चार चालाकियों-खोटा सोचने, खोटा बोलने, खोटा चाहने और खोटा करने से आती है। खोट और खराबी का गहरा संबंध है। खोट जहां होती है, वहां खराबी आती है और खराबी जहां रहेगी, वहां खोट अवश्य मिलता है। मनुष्य के भव में खराबी का नहीं, अपितु खूबियों का जीवन जीना चाहिए। खूबियों वाला अच्छा सोचता, बोलता, चाहता और अच्छा ही करता है।
आचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति की बुद्धि निर्मल तभी होती है, जब वह खराबियों से दूर रहेगा। साधना से मन को सही दिशा मिलती है, इसलिए सभी साधना में लग जाए। साधना होगी, तो हमारी गति को प्रगति मिलेगी, अन्यथा जीवन मलीनता से जूझता रहेगा। मलीलना दुर्मति का दोष है। इसे दूर किए बिना सन्मति नहीं आएगी और सन्मति नहीं होगी, तो सदगति नहीं मिलेगी।
आरंभ में उपाध्याय प्रवर, प्रज्ञारत्न श्री जितेश मुनिजी मसा ने आचारण सूत्र का वाचन किया। उन्होंने पाप से बचने के मंत्र बताए। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भी संबोधित किया। आदर्श संयमरत्न श्री विशालप्रिय मुनिजी मसा ने श्रावक-श्राविकाओं से प्रवचनों पर आधारित रोचक प्रश्न किए। कई धर्मावलंबियों ने तप आराधना के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।