- संदेह का निराकरण
(वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अत्यंत ही प्रासंगिक ) - साभार :श्री अमर भारती-मार्च 1972 (भगवान महावीर का सामाजिक कर्त्तव्य )
रचनाकर: उपाध्याय अमर मुनि
संकलन : सुरेन्द्र मारू, इंदौर


भगवान् के निवृत्ति प्रधान जीवन में भी हम लोक कल्याण की प्रवृत्ति और सामाजिक चेतना की बहुत बड़ी निर्मल झलक पाते हैं। एक ओर इतने बड़े धर्मसंघ का नेतृत्व, उसकी जिम्मेदारियां, और साथ ही दूसरी ओर समाज के प्रत्येक अंग का निरीक्षण, उसकी उलझनों का समाधान, शंका और वहम का निराकरण, भूलों का शोधन और पारस्परिक विग्रह एवं द्वंदों का उपशमन। विश्वजनहिताय प्रवृत्ति की हजारों हजार तरंगे उनके जीवन- महासागर में एक साथ लहराती दिखाई दे रही है।
समाज की उलझनों और समस्याओं का कितनी दूर तक उन्होंने स्पर्श किया था, इसका एक उदाहरण जैन कथाओं में मिलता है। एकबार सम्राट श्रेणिक के मन में अपनी पत्नी चेलना रानी के प्रति संदेह हो गया कि वह सती नहीं है। किसी अन्य पुरुष की प्रति आकर्षण है, उसके मन में। बस, सम्राट समग्र नारी जाति के प्रति ही अपवित्रता के वहम के शिकार हो गए, और आदेश दे दिया कि चेलना और अन्य सब रानियों को जलाकर भस्म कर दिया जाए।
एक निराधार वहम के कारण कितनी भयंकर दुर्घटना होने जा रही थी। समूचा अंत:पुर को अग्नि की दहकती ज्वालाओं में भस्मसात् करने का कितना भयंकर हत्याकांड हो रहा था, किंतु भगवान महावीर ने भटकते सम्राट को संबोधित किया – “राजन् ! तुम भ्रांति में हो, व्यर्थ ही संदेहों के भंवर में फंस गए हो। महाराज चेटक की सातों ही पुत्रियां सती है। रानी चेलना का जीवन पवित्र और निर्मल है। वहम अज्ञान के कारण होता है। सत्य को जानोगे तो वहम को दूर होते देर न लगेगी। तुम वहम के झंझावात में मत भटको । वहम भयंकर अनर्थ और विपदाओं का जनक है।” सम्राट् घटना की वास्तविकता समझ गए और एक भयंकर अनर्थ होते-होते रह गया।
झूठे वहम के कारण आज समाज में कितने विग्रह और कलह चल रहे हैं, कितनी गृहस्थियां उजड़ रही है, कितने परिवार इसकी चपेट में आकर बर्बाद हो रहे हैं। समाज में एक सिरे से दूसरे सिरे तक यह भयानक रोग महामारी की तरह फैला हुआ है। पति-पत्नी एक दूसरे को सन्देह की दृष्टि से देखते हैं, पिता- पुत्र में वहम के कारण अनबन है, भाई-भाई में परस्पर अविश्वास है। वहम और संदेह के कारण समाज का जीवन नीरस हो रहा है, प्रेम के तार टूट रहे हैं, परस्पर अविश्वास और कलह का वातावरण छाया हुआ है। आज आवश्यकता है, प्रभु महावीर जैसे तत्त्वज्ञानियों की, जो अपने पवित्र हस्तक्षेप से समाज की भ्रांत चेतना को समय पर सत्य का प्रकाश दे सकें।
भगवान् महावीर के जीवन का यह सामाजिक पक्ष कितना – महत्वपूर्ण और कितना विराट् है।समाज के हर अंग को वे छूते हैं। पारस्परिक कलह और विग्रह जब भी, जो भी उनके सामने आते हैं, वह उन्हें सुलझाते हैं। पारिवारिक उलझनों का यथोचित कल्याणकारी समाधान उनके द्वारा होता है। राजकीय विग्रह के नाजुक प्रसंगों पर भी उनकी प्रज्ञामयी वाणी मुखर होती है और वहां भी शांति एवं सुव्यवस्था स्थापित हो जाती है।