प्रसिद्ध होना आसान, लेकिन सिद्ध होना कठिन-आचार्य श्री विजयराजजी मसा

  • तपस्वीयों की अनुमोदना करते हुए कहा
  • तप और त्याग से ही चल रहा प्रभु का शासन

रतलाम,30 जुलाई। परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने अभ्युदय चातुर्मास में चल रहे तप और त्याग की अनुमोदना करते हुए कहा कि सांसारी चाहता है कि वह प्रसिद्ध हो और साधक चाहता है कि वह सिद्ध हो। प्रसिद्ध होना आसान है, लेकिन सिद्ध होना कठिन है। साधक के मन में कभी प्रसिद्ध होने का भाव नहीं होता, लेकिन जो सिद्ध होता है, वह प्रसिद्ध अपने आप हो जाता है।
छोटू भाई की बगीची में रविवार के विशेष प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा कि सिव्द्ध होने के लिए समर्पण करना पडता है। व्यक्ति जब तक समर्पित नहीं होता, तब तक उसे सिद्धी नहीं मिलती। समर्पण अपनी इच्छाओं का होता है। इच्छा ऐसी है कि एक खत्म नहीं होती और दूसरी हो जाती है। इच्छाओं का मकडजाल ऐसा रहता है, कि व्यक्ति इनमें फंसता ही चला जाता है। अपनी इच्छाओं का जो समर्पण करता है, वह इच्छाजयी होता है। संसार में रहने वाले इच्छाजीवी होते है, लेकिन सिद्ध बनने के लिए इच्छाजयी बनना पडता है।
आचार्यश्री ने कहा कि बेला, तेला, अठठाई, मासक्षमण की तपस्या नहीं हो, तो श्रावक-श्राविकाओं को अपनी इच्छाओं का दमन करना चाहिए। इच्छाओं का दमन नहीं करने वाला तप में कभी आगे नहीं बढ पाता है। अपनी आवश्यकताओं को कम करना और इच्छाओं का दमन करना ही तपस्वी का मूल लक्षण है। त्यागी वही कहलाता है, जो संपन्न होते हुए भी त्याग के प्रति समर्पित रहता है। देव, गुरू और धर्म के प्रति सबको समर्पित होना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि तप और त्याग की अनुमोदना तप और त्याग से ही होती है। त्याग और तप से ही प्रभु का शासन चल रहा है, इसलिए अधिक से अधिक तप और त्याग कर तपस्वियों की अनुमोदना कर सबको सिद्धी के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए। आरंभ में उपाध्याय प्रवर, प्रज्ञारत्न श्री जितेश मुनिजी मसा ने आचारण सूत्र का वाचन करते हुए वनस्पतियों पर प्रकाश डाला।
विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भी संबोधित किया। मासक्षमण का कठोर तप कर रहे सेवानिष्ठ, एकान्तर तप के तपस्वी श्री जयमंगल मुनिजी मसा ने भी भाव व्यक्त किए। विद्यावाग्नी महासती श्री गुप्तिजी मसा ने 29 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। तपस्विनी, सेवागुण संपन्न महासती श्री निरूपणाश्री मसा 20 उपवास की तपस्या के प्रत्याख्यान लिए। संचालन हर्षित कांठेड ने किया।