जीवन बाग और बैर आग है, अपने बाग में आग मत लगाइये-आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी म.सा.

छोटू भाई की बगीची में हुए प्रवचन

रतलाम 7 अगस्त। अपराध बोध, बैर की भावना से मुक्ति का सबसे सरल मार्ग है। इसके बिना बैर का शमन नहीं होता। हमारा जीवन बाग है और बैर आग है। इस आग से अपने बाग को मत जलाइये। बैर की अग्नि बहुत बडी होती है। क्षमा पानी है, जिससे बैर की अग्नि बुझती है। बैर की अग्नि में धिक्कार, तरस्कार और दुत्कार पेट्रोल का काम करते है। इनसे बचे और क्षमा के पानी से बैराग्नि का हमेशा-हमेशा के लिए बुझाए।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन में जाने-अनजाने में बैर भावना से हमारा लिंक जुड ही जाता है। इससे अपराध बोध ही मुक्त करता है और उसके लिए ग्लानि का भाव होना चाहिए। ग्लानि हमारे बैर भाव को खत्म करती है। अपराध करते समय लज्जा और बाद में ग्लानि हो, तो बैर भाव निश्चित रूप से खत्म हो जाता है।
आचार्यश्री ने कहा कि बैर भाव खत्म होने पर शांति, शीतलता और प्रसन्नता की अनुभुति होती है। व्यक्ति को जब तक अपराध बोध नहीं होता, तब तक उसका मन कचोटता रहता है। बैर का भाव दुर्मति का ऐसा दोष है, जिसे व्यक्ति यदि समझ लेता है, तो वहीं सन्मति के जागरण का अवसर होता है। उन्होंने कहा कि पश्चाताप और प्रायश्चित दोनो ग्लानि के रूप है। व्यक्ति जब इनसे अपने को शुद्ध कर लेता है, तो यही शुद्धि उसके लिए सिद्धी बन जाती है। शुद्धि के बिना सिद्धी नहीं होती।
आचार्यश्री ने पाप करके जो पश्चाताप करता है, वह नर्क में नहीं जाता और पाप करके जो प्रसन्न होता है, वह स्वर्ग में नहीं जाता है। पाप करना हमारी लाचारी हो सकती है, लेकिन अपराध बोध होगा, तो बैर नहीं बंधेगा। इसके लिए पश्चाताप आग और प्रायश्चित पानी है। पश्चाताप पाप को जलाता है, जबकि प्रायश्चित पाप को बहा ले जाता है। शेक्सपीयर ने कहा कि प्रेम सबसे करो, विश्वास कुछ पर करो, लेकिन बैर किसी से मत करो। इसलिए बैर से बचकर सभी अपने जीवन को सन्मति के मार्ग पर ले जाए।
उपाध्याय प्रवर, प्रज्ञारत्न श्री जितेश मुनिजी मसा ने इससे पूर्व आचारण सूत्र का वाचन किया। उन्होंने हर प्रकार की हिंसा से बचने का आव्हान करते हुए कहा कि जो अपने जीवन के लिए दूसरो का जीवन नहीं बिगाडता, वही श्रेष्ठ होता है। इस मौके पर विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भाव व्यक्त किए। प्रवचन के दौरान बडी संख्या में श्रावक-श्राविकागण उपस्थित रहे।