छोटू भाई की बगीची में प्रवचन
रतलाम,01 सितंबर। परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने विलासिता को असंतोष की आत्मा बताया है। उन्होंने कहा कि जिसके जीवन में भी विलासिता बढती है, उसके अंदर असंतोष बढता है। संतोष से रहना हो, तो संयम में रहो। संयम और संतोष एक दूसरे के पूरक है।
छोटू भाई की बगीची में चार्तुमासिक प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में यदि संतोष आ गया, तो हमारी मति सन्मति बन जाएगी और सन्मति ही सदगति का आधार है। संतोष के लिए संयम का रहना आवश्यक है। जीवन में जितना संयम घटित होगा, उतना ही संतोष चला आएगा। अर्थशास्त्र व्यक्ति को विलासी बनाता है, लेकिन धर्मशास्त्र संयम की और ले जाते है। अर्थशास़्त्र आवश्यकताओं और उपयोगिताओं को महत्व देकर असंतोष को बढाने वाला होता है, जबकि धर्मशास्त्र संयम से संतोष की और ले जाने वाले है।
आचार्यश्री ने कहा कि संयम कन्ट्रोलिंग पावर से आता है। ये पावर जितना मजबूत होगा, उतना संयम जीवन में आएगा। अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को नियंत्रित करना ही संयम है। वास्तविक अर्थों में चाहे साधु हो अथवा ग्रहस्थ हो उनके लिए संयम और संतोष ही जीवन है। जीवन में यदि संतोष होगा, तो वह महान बनेगा। संतोष का जीवन आनंद देता है, जबकि असंतोषी का हमेशा मजाक बनता है। लोग कहते है कि बूढा हो गया, फिर भी संतोष नहीं है। संयम ही संतोष लाता है, इसलिए सबकों संयमी जीवन जीना चाहिए।
आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनिजी मसा ने आचारण सूत्र का वाचन करते हुए तप और त्याग की महिमा बताई। उन्होंने आचार्यश्री की निश्रा में हो रही तपस्या और त्याग का अनुमोदन तप और त्याग से करने का आव्हान किया। इस मौके पर आचार्यश्री से महासती मोहकप्रभाजी मसा ने 29 एवं महासती चिंतनप्रज्ञाजी मसा ने 11 उपवास की तपस्या के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। इस दौरान सैकडों श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।