
रतलाम, 5 सितंबर। दुनिया में ऐसा कोई दुख नहीं है जो आपको अकेले को मिला है और किसी को नहीं मिला हो, तो फिर दीनता क्यों है और ऐसा कोई सुख नहीं है जो आपको मिला है और दूसरे को नहीं मिला, फिर अहंकार क्यों है। सुख जीवन के पुण्य को खत्म करता है और दुख जीवन के पाप को खत्म करता है। संसार में दुख तो आते ही है। दुख कोई भी आए, कैसा भी आए उसे स्वीकार करना चाहिए। सुख, दुख और पाप-पुण्य के प्रति हमारा नजरिया बदला क्यों रहता है।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा के शिष्य मुनिराज ज्ञानबोधी विजयजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टॉकीज में कही। मुनिराज ने कहा कि सुख आए तो वेलकम और दुख आए तो मोस्ट वेलकम कहो। हमारे लिए मिले तो संयम वृत्ति और न मिले तो तपोवृत्ति यह भाव होना चाहिए। जैसे दूध को पतला करने के लिए पानी मिलाते हो, वैसे ही पाप के अंदर आंसू का पानी मिला दो वह पतला हो जाएगा।
मुनिराज ने कहा कि आप दुखी इसलिए है कि अच्छी यादें पेन ड्राइव में सेव की है और बुरी यादें दिमाग में सेव करके रखी है। आप लोकेशन चेंज कर लो अपने आप सुखी हो जाओंगे। सुख के प्रति तिरस्कार भाव लाना है। दुख निकालने जैसा नहीं भुगतने जैसा है। दुख आश्चर्य नहीं है, लेकिन सुख आश्चर्य है।
मुनिराज ने कहा कि सुख आता है तो हम उसे भुगतते जाते है। वह हमारे पुण्य का क्षय करता है। जिस प्रकार से बैंक खाते से पैसे निकालते जाते है तो बैलेंस कम होते जाता है, ठीक उसी प्रकार से पाप का भी क्षय होता है। श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी द्वारा आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।