घर में धार्मिक संस्कार का स्थान होना चाहिए – गुरुदेव श्री अरुणमुनि जी म.सा.

रतलाम। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ नीमचौक पर पर्युषण महापर्व पर प्रवचनकार पूज्य गुरुदेव श्री अरुणमुनि जी म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि जिस परिवार का चारों और से अनुसरण किया जाए, जिस परिवार से सभी लोग प्रेरणा ग्रहण करे और अपने अंदर परिवर्तन लाने का प्रयास करे ऐसा परिवार आदर्श परिवार कहा जाता है। पुराने समय में आश्रम व्यवस्था थी, ब्रह्मचर्य आश्रम, ग्रहस्थाश्रम, सन्यास आश्रम एवं वानप्रस्थ आश्रम । इन चार आश्रमों में ग्रहस्थाश्रम का विशेष महत्व बताया गया है। ग्रहस्थाश्रम अगर अच्छा होगा तो उससे निकलने वाले सन्त भी अच्छे निकलेंगे। परिवार तो पशुओं का भी होता है, परन्तु उनमें कोई नियमावली नही होती है, संस्कार नही होते है। ० परिवार एक प्रकार का खेत है, खेत को उपजाऊ बनाना एक आदर्श किसान के हाथों में होता है । परिवार का मुखिया चाहे तो अपने परिवार को आदर्श परिवार बना सकता है, और परिवार को दूषित करना भी उसके हाथ में होता है। जैसा हमारा जीवन होगा वैसे ही हमारे जीवन की परछाई होगी। माता पिता कहते है की बच्चे उनकी सुनते नही है, उद्दंड है, बच्चे नियंत्रण में नही रहना चाहते है। अगर आपने अपने माता पिता को सम्मान दिया होगा तो ही आपकी संतान आपका कहना मानेगी, आपका सम्मान करेगी। वृक्ष जैसा होगा उस पर फल वैसे ही आएंगे, आम के वृक्ष पर आम, नीम के वृक्ष पर निम्बोली ही आएगी। एक कहावत है घड़ा जेवी टीकरी, माँ जेवी डिकरी। माँ संस्कारी है तो बेटी भी संस्कारी होगी, परिवार को संस्कारित करना आपके अपने हाथों में है। परिवार में प्रेम बढाने के लिये आपसी मेलजोल होना बहुत आवश्यक है, चर्चा होना बहुत आवश्यक है। परिवार में आपसी मतभेद एंव वैचारिक मतभेद स्वाभाविक है, लेकिन उन मतभेदों का निराकरण होना बहुत जरूरी है। मुखिया सोचता है की सब उसकी बात माने, लेकिन मुखिया को भी छोटो की बात समझने का प्रयास करना चाहिए और छोटो को बड़ो का सम्मान करने की भावना होना चाहिए। संतान कितनी भी खराब क्यों न हो उसमें कितने भी अवगुण क्यों न हो लेकिन सबके सामने आप उसकी बुराई नही करते है। लेकिन सन्त सतियों में छोटी सी कमी आपको दिखाई देती है तो आप उसको प्रचारित प्रसारित करने से चूकते नही है । आप ही तो सन्त सतियों के अम्मा पिया कहलाते है, फिर ऐसा भेदभाव अपनी संतान के साथ क्यों । लक्ष्मी भी वंही निवास करती है जँहा गुरु को पूजा जाता है, सन्त महापुरुषों के प्रति सम्मान की भावना रहती है। दूसरा जिस परिवार में अच्छी वाणी का अच्छे शब्दों का प्रयोग होता है, क्योंकि वाणी से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान होती है। खानदानी व्यक्ति के हाथों में कोई कमल का फूल नही होता है और कुलहीन व्यक्ति के सर पर सिंग भी नही होते है। व्यक्ति की वाणी और बोलने के वार्तालाप के तरीके से ही व्यक्ति के कुल का पता चलता है। तीसरा लक्ष्मी वँहा रहती है जँहा गृह क्लेश न हो । परिवार में किसी ने किसी को कुछ कह दिया तो उस बात को खींचने का प्रयत्न नही करना, उग्रतापूर्वक प्रत्युत्तर नही देना तो क्लेश नही होगा। दुकान सम्भालना पुरूष के हाथों में और घर को नारी सम्भाल सकती है। दुकान की शोभा पुरूष के हाथ में, और घर की शोभा स्त्री के हाथों में होती है। इस प्रकार जँहा गुरु की पूजा होती है, अच्छी वाणी का प्रयोग होता है, क्लेश वाद विवाद नही होता है लक्ष्मी वँहा निवास करती है। माता पिता मेरे साथ रहते है यह घमंड है और मैं माता पिता के साथ रहता हुँ ये विनम्रता और सँस्कार है। सफल परिवार में घर के बड़े अपने अनुभव छोटों को बताते है और छोटे विनम्रता के साथ उनके अनुभव का लाभ लेकर कार्य को अंजाम देते है। कोई व्यक्ति आपको नालायक कहे तो इसे दो प्रकार से सोचे। पहला अपने आप को जाँचे क्या आप वास्तव में नालायक है अगर है तो उसका अहसान माने की उसने आपको वास्तविकता से अवगत करवाया एवं अपनी नालायकी को सुधारने का प्रयास करे, और अगर आप नालायक नही है तो उसके कहने से आपको कोई फर्क नही पड़ेगा, क्योंकि किसी के कहने से कोई नालायक नही हो जाता है। बच्चों को बचपन से ही धार्मिक सँस्कार देने की परंपरा अब खत्म होती जा रही है। माता पिता खुद कहते है की अभी बच्चा है जब बड़ा होगा तब सीख लेगा। और वो ही बच्चा फिल्मों के गाने और हीरो हीरोइन के नाम याद रख लेता है। घर में धार्मिक संस्कार का स्थान होना चाहिए, जितना महत्व धन को दिया जाता है उतना ही महत्व धर्म को देना आवश्यक है, अतिथी देवो भव ये भावना भी संस्कारी घर में होती है।