

संक्षिप्त जीवन वृत
प्रस्तुति : विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा
उपाध्याय प्रवर श्री मूल मुनि जी म.सा का जन्म पाली मारवाड़ मे हुआ! आपके पिताश्री का नाम सेठ बस्ती चंद जी गादिया एवम माता जी का नाम भीखी बाइ था!
आप जब मात्र नो वर्ष के थे आपकी पूज्या मातुश्री का देहावसान होगया एवम कुछ ही समय के अन्तराल में आपके भाइ व बहन का भी देहान्त हो गया! इतनी कम वय में यह आधात लगा जो बहुत ही कष्टदायी था! पर काल का ओर वज्रपात हुआ 12 वर्ष की उम्र में पूज्य पिताश्री का भी देहावसान होगया ! कितना बड़ा वज्रपात हुआ जिसकी कल्पना करना भी कठिन हे!
वेराग्य भाव
श्री मूल चंद जी पांच वर्ष तक गुरुकुल में रहे जंहा शिक्षा और संस्कृति के संस्कार पल्लवित हुए एक बार पाली में श्री कन्हैया लाल जी म.सा के व्याख्यान सुनने को गये उस प्रवचन में जैन दिवाकर जी द्वारा रचित जम्बु कुमार चरित्र पर प्रवचन चल रहा था वहा उन्होंको सांसारिक क्रिया कलापों भोगों से विरक्ति हो गइ ! संयोग की बात संवत 1997 का चातुर्मास जैन दिवाकर गुरुदेव श्री चौथमल जी म.सा का जोधपुर में चल रहा था ! पांच किशोर उनके दर्शन करने जोधपुर गये वंहा जैन दिवाकर जी महाराज ने सहज में पूछा , दीक्षा कौन लेगा , मूल चंद जी ने स्वीकृति स्वरूप हाथ खड़ा कर दिया !
भागवती दीक्षा
इस तरह सत्रह वर्ष की यौवन वय में आपने समदड़ी ( मारवाड़) में संवत 1997 की फाल्गुन कृष्णा पंचमी को जैन दिवाकर जी महाराज से दीक्षा अंगीकार करली एवम जैन दिवाकर जी महाराज ने आपको श्री वृद्धि चंद जी महाराज ( बड़ी सादड़ी वाले) का शिष्य घोषीत किया!
आयम्बिल तप आराधना
संयम ग्रहण करने के दो वर्ष बाद से ही आपने प्रति रविवार आयम्बिल का तप प्रारम्भ किया जो जीवन के अन्तिम समय तक चलता रहा याने लगभग 79 वर्ष तक प्रति रविवार आयम्बिल तप की आराधना की
गुरु सेवा में दस वर्ष उपाध्याय श्री गुरु जैन दिवाकर जी की सेवा में लगभग दस वर्ष तक रहे और उनसे , जीवन, जगत, और साधना के बारे में अनेकानेक बाते व आगम ज्ञान सीरवा तथा प्रवचन शैली विकसित की!
सरलता व सम दर्शिता
श्री मूल चंद जी म.सा उपाध्याय श्री कस्तुर चंद जी म.सा के सानिध्य में14 वर्ष तक रहे! उनके साथ रह कर निम्न-मध्यम वर्गो के लोगो के कष्टो का अनुभव किया उपाध्याय श्री मूल मूनि जी म.सा यह बात कहते थे कि उपाध्याय श्री कस्तुर चंद जी म.सा ने मेरे अन्दर करुणा के भाव भरे ! छोटो को सम्मान देना भी मैंने उपाध्याय श्री कस्तुर चंद जी म.सा से सीरवा ! उनके पास कोई भी जाता सब उनके लिए बराबर थे!
साधार्मिक सेवा
उपाध्याय श्री कस्तुर चंद जी म.सा के सानिध्य मे रहकर साधार्मिक सेवा का कार्य उन्होंने देखा ! उपाध्याय श्री मूल मुनि ने बहुत आगे विशाल पैमाने पर बढ़ाया वे लोग जो उपाध्याय श्री के करीबी रहे उन्हे मालूम है कि वह किस तरह साधार्मिक सेवा करवाते व प्रेरणा देते!
उपाध्याय जीकी इस साधार्मिक सेवा में कई समुदायो के लोग जुड़े थे!
मधुर प्रवचन शैली
उपाध्याय श्री की प्रवचन अत्यन्त ही प्रेरणास्पद , प्रभावी , सरल, सहज, एवम गहरे भाव लिये होते थे इसही लिए इन्हें मधुर वक्ता की पदवी से सम्मानित किया ! आपके प्रवचनो में विशेष रूप से , मानवता, समता, एकता, प्रेम, करुणा पर जोर रहता!
इन्द्र धनुषी व्यक्तित्व
इन्द्र धनुषी व्यक्तित्व के धनी श्री उपाध्याय जी महाराज , गद्य व पद्य के अच्छे रचनाकार थे! करीब दो दर्जन कृतिया उनकी साहित्य प्रतिभा का प्रमाण हे! उपाध्याय श्री ने कह चरित्रो की रचना की जिनको कई साधु – साध्वी धारावाहिक के रूप में चातुर्मास में सुनाते हे ! आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी के शब्दो में – मुनि प्रवर श्री मूल मूनि जी की कविता में अपूर्व लालित्य हे!
बेमिसाल गुरु भक्ति एम पद की कभी चाह नही की
पूज्य उपाध्याय श्री मूल मुनि जी महाराज , पूज्य गुरुदेव श्री जैन दिवाकर जी म.सा के प्रति पूर्ण समर्पित रहे तथा सदैव यह ही कहते सब कुछ गुरुदेव का दिया हुआ हे सब गुरु के चरणों में समर्पित हे!
उन्होने अपने जीवन में पद की लालसा नही रखी सन 1994 मे जब उपाध्याय गुरुदेव कविवर श्री केवल मुनि जी म.सा का देवलोक गमन हो गया तब उनको उपाध्याय पद स्वीकार करने के लिए बड़ी मुश्किल से मनाया गया !
उपाध्याय श्री के मधुर गीतो में
अभी समय हे हाथ में सम्बल लेलो साथ में जंहा कही जाओगे आनन्द पाओगे बहुत ही यादगार गीत है इसगीत ने कइयों के जीवन को बदला है!
जैन दिवाकर जी महाराज के प्रति उन्होंने बहुत कुछ लिखा पर उनके दो भजन सबकी जबा पर रहते है
गुरु जैन दिवाकर पर उपकारी जग को जगाने आये थे
2 गुरुवर दयाल के दिल महा विशाल के
गीतो को कभी नही भुला पाएगें!
साहित्य प्रकाशन की प्रेरणा श्री जैन दिवाकर साहित्य के पुनः प्रकाशन के प्रेरणा पूंज उपाध्याय श्री मूल मुनि जी म.सा ही रहे व विपिन जी जारोली ने इसे पूर्ण करने में पुरा श्रम किया पूज्य उपाध्याय श्री ने इस कार्य हेतु मुझे भी आदेश दिया ! उनकी याद जीवन भर बनी रहेगी ! दिनांक 26 सितम्बर 2021 रविवार को संथारे सहित कोटा में उनका देवलोक गमन हुआ !उनसे जुड़ी कई बाते है जो कभी भुलाइ नही जासकती उनका स्मरण आते ही नयन भर आते हे उनके श्री चरणों में अनेकानेक वंदन , जहा भी हो कृपा बरसती रहे
विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा( पूणे)
उपाध्यक्ष: अ. भा. श्वे. स्था. जैन कांफ्रेस नइ दिल्ली , ज्ञान प्रकाश योजना!
स्थाई न्यासी: अ. भा. श्री जैन दिवाकर संगठन समिती( रजि.)
मंत्री: श्री जैन दिवाकर साहित्य प्रकाशन समिती चितौड़गढ( रजि.)