छोटू भाई की बगीची में विजयादशमी पर प्रवचन
रतलाम,24 अक्टूबर। भारत पर्वो का देश है। हर पर्व का अपना संदेश है। विजयादशमी का पर्व असत्य पर सत्य, अन्याय पर न्याय और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। दूसरों पर विजय पाना आसान है, लेकिन खुद का जीतना मुश्किल है। अपने आप पर जो विजय पा लेता है, उसे दूसरों को जीतने की जरूरत हीं नहीं पडती है।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। विजयादशमी पर छोटू भाई की बगीची में प्रवचन देते हुए उन्होंने कहा कि दूसरों पर विजय पाने वाला भी यदि अपने आप पर विजय नहीं पाता, तो उसकी जीत संपूर्ण नहीं होती है। उसका जीवन दुविधा में ही निकल जाता है। आंतरिक विजय पाने के लिए लक्ष्य बनाना चाहिए, क्यांकि लक्ष्य बनता है, तो दिल में दृढता और दिमाग में स्थिरता आती है।
आचार्यश्री ने कहा कि राम-रावण प्रतीक है। समय का महत्व समझकर सबकों लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। इस जीवन में राम भी बन सकते है और रावण भी बन सकते है। रावण आसुरी वृत्ति का था और राम देव वृत्ति के थे। अपने अंदर यदि राम को जगाने का लक्ष्य रखेंगे, तो मन के रावण का अंत हो जाएगा। मन में यदि राम जाग गए, तो जीवन में कभी पराजय नहीं होगी। समय की सार्थकता के लिए पुरूषार्थ जरूरी है। पुरूषार्थ से हर मंजिल को पाया जा सकता है।
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य का जीवन बहुत पुनवानी से मिलता है। इसमें धर्म-आराधना कर आत्म कल्याण के मार्ग पर चलना श्रेयस्कर है। आज मन के राम को जगाने की महती आवश्यकता है। जीवन में राम होंगे, तो कोई रावण कभी कुछ बिगाड नहीं पाएगा। आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनिजी मसा ने कहा दूसरों को जीतना बहादुरी नहीं होती। खुद को जीत सके, वहीं जीवन बहादुर होता है। विजयादशमी पर सबकों अपने आप पर विजय पाने का संकल्प लेना चाहिए। प्रवचन में तप-आराधना के प्रत्याख्यान लिए गए। इस दौरान बडी संख्या में श्रावक-श्राविकागण उपस्थित रहे।