जीवन में अपेक्षा, आग्रह और आसक्ति को छोड़ना चाहिए – आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा.

रतलाम। जीवन कैसे जीना है यह सभी धर्म सिखाते हैं लेकिन मरना कैसे है यह सिर्फ शास्त्र ने सिखाया है। आज व्यक्ति का जन्म भी अस्पताल में हो रहा है और मृत्यु भी अस्पताल में हो रही है। हम जीवन में सारे जतन कर लेते हैं लेकिन संयम की प्राप्ति नहीं होती है। क्योंकि संयम के लिए चारित्र निर्माण आवश्यक है। कंजूस व्यक्ति का जैसे एक भी रुपया खराब नहीं होता, वैसे ही साधक का एक मिनट भी बर्बाद नहीं जाना चाहिए।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टॉकीज में चल रहे प्रवचन में कहीं। उन्होंने कहा कि चारित्र जीवन के लिए योग्य समय, व्यक्ति और स्थल जरूरी है। मरते वक्त भी मनुष्य को अस्पताल में पीड़ा भोगना पड़ती है। वह अपने परिवार के सदस्यों से भी नहीं मिल पाता है। हमें कम से कम अंतिम समय में दुनिया से नाता तोड़ कर प्रभु से नाता जोड़ना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि योग्य स्थल, समय, सानिध्य, स्वस्थता और शुद्धि ये पांच चीजे हमारे हाथ में नहीं है, ये सभी प्रभु के हाथ में है, इसलिए हमें प्रभु से प्रार्थना करना चाहिए कि प्रभु इस काया से मैं मुक्त बनू उसके पहले मोह, माया और ममत्व से मुक्त हो सकू। इसके माध्यम से ही हम इन पांच चीजों के मालिक बन सकते है।
आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपेक्षा, आग्रह और आसक्ति को हमे त्यागना होगा। जिस सुख के पीछे हम भागते है, अंत में दुख के सिवाए हमे कुछ नहीं मिलता है। जहां आसक्ति होती है, वहां दुर्गति होती है। प्रभु ने मानव भव को सार्थक करने का संदेश दिया है। श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी द्वारा आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।