आचार्य प्रवर विजयराजजी म.सा. की निश्रा में पगारिया हाऊस में हुए प्रवचन
रतलाम, 03 दिसंबर। धर्म करने वालों को सुख मिलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं। उन्हें दुःख मिले तो वे घबराते नहीं, वे दुःख का स्वागत करने में/स्वीकार करने में वीरता दिखाते है। ऐसा वीर ही भविष्य का महावीर बनता है। संसार में सबसे सरल है धर्म साधना।किसी पंथ-परंपरा का क्रिया-कांड या विधि विधान धर्म नही है।
यह बात उपाध्याय प्रवर प्रज्ञारत्न श्री जितेशमुनि जी म.सा. ने पगारिया हाउस में प्रवचन के दौरान कही। परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युग पुरूष आचार्य प्रवर विजयराजजी म.सा. की निश्रा में उन्होंने कहा धर्म है अपने मकान को स्वच्छ रखने की प्रक्रिया। मकान को स्वच्छ रखना है तो दो बातें की जाती है – आते हुए कचरे को रोकने के लिए दरवाजें खिड़कियां बंद कर देना व आए हुए कचरे को बाहर निकालना। बस यही तो धर्म है। जीवन में पाप का प्रवेश न हो इसकी सावधानी रखना व जो पाप आ चुका है उसको बाहर निकालना यही सीधा, सरल, सच्चा धर्म है।
आपने कहा – धर्म करने से बिमारी नहीं आएगी इसकी गारन्टी नहीं है मगर धर्म करने वाला बिमारी में भी समाधी भाव में रहेगा यह धर्म की गारन्टी है। धर्म करने से धन मिलेगा इसकी गारन्टी नहीं है किन्तु धन के अभाव में भी जीवन धन्य बन सकता है यह धर्म की गारन्टी है। धर्म करने से परिवार प्रतिकूल नहीं रहेगा इसकी गारन्टी नहीं है किन्तु पारिवारिक प्रतिकूलता में भी चित्त की प्रसन्नता बनी रहेगी यह धर्म की गारन्टी है। धर्म करने से दुःख नहीं आएगा यह धर्म की गारन्टी नहीं है किन्तु दुःख आने पर भी इंसान दुःखी नहीं होगा यह धर्म की गारन्टी है।
उपाध्याय प्रवर ने कहा कि वास्तव में धर्म से ही भीतर का सुख, स्वाधीन सुख व सदा काल का सुख मिलता है। धर्म वही है जो तत्क्षण फल दे, जिसका फल तत्क्षण न मिले वह धर्म नहीं कर्म ही है। धर्म करने वाले के जीवन में दुःख आता है। जल्दी-जल्दी दुःख आता है यह बात तय है। धर्मी हो, अधर्मी दोनों के जीवन में दुःख आता है। अधर्मी के जीवन में जो दुःख आता है वह उसे दुःखी करने के लिए आता है और धर्मी के जीवन में जो दुःख आता है वह उसे दुःख से मुक्त कराने के लिए आता है। आया हुआ दुःख अधर्मी के लिए अभिशाप बनता है, तो धर्मी के लिए वही दुःख वरदान बनता है।