25 दिवसीय बृहद् भक्तामर विधान का समापन हुआ 48 मण्डलीय भक्तामर महामण्डल विधान के साथ

भागलपुर । श्रमण मुनि विशल्यसागर प.पू. भारतगौरव राष्ट्रसंत गणाचार्य श्री 108 विरागसागर जी मुनिराज के परम प्रभावक शिष्य झारखण्ड राजकीय अतिथि , सराककेसरी , श्रुतवारिधि श्रमण श्री विशल्यसागर जी मुनिराज ससंघ के सानिध्य में 15 दिसम्बर 20 23से 8 जनवरी 2024 तक 25 दिवसीय बृहद् भक्तामर महामण्डल विधान का समापन 48 मण्डलीय भक्तामर महामण्डल विधान भागलपुर ( बिहार ) में साथ सानंद सम्पन्न हुआ । इसी अवसर पर प.पू. श्रमण मुनि विशल्यसागर जी महाराज ने कहा कि भगवान की भक्ति चित्त को स्थिर करने का प्रमुख आयाम है , विधान के माध्यम से अंतर्मन विशुद्ध होकर चित्त एकाग्र होता है । भगवान की भक्ति भक्त को भगवान बनाती है बस जरूरत है भक्ति में लीन होने की आचार्य मांगतुंग की तरह । आचार्य मांगतुंग स्वामी आदिनाथ भगवान की भक्ति में इतने मग्न हो गये कि ताले स्वयंमेव ही खुल गए और अंतस के भाव भक्तामर स्तोत्र के रुप में रच गया । इसी अवसर पर आचार्य भगवन वात्सल्य रत्नाकर , निमित्त ज्ञानी विमलसागर जी मुनिराज का समाधि दिवस महा महोत्सव भी बड़े धूमधाम से मनाया गया ।