आचार्य प्रवर विद्यासागर जी को शत-शत वंदन

सुरेश जैन (आई.ए.एस.)
न्‍यायमूर्ति विमला जैन
30, निशातकॉलोनी, भोपाल, मध्‍यप्रदेश 462 003
मो 94250 10111

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने 6 फरवरी, 2024 को अपना आचार्य पद अपने द्वारा सर्वप्रथम दीक्षित ज्‍येष्‍ठ और श्रेष्‍ठ निर्यापक श्रमण समयसागर जी महाराज को सौंप दिया तथा 14 फरवरी, 2024 को उन्‍होंने उपवास और अखण्‍ड मौन लेकर परम समाधि की दिशा में प्रस्‍थान शुरु कर दिया। आचार्य श्री विद्यासागर जी के त्‍याग और वैराग्‍य के यश का जो सूर्य 1970 और 1980 के दशक में नैनागिरि में चमकना शुरु हुआथा, वह 2024 में चन्‍द्रगिरि में अस्‍त हो गया। उनके अंतिम दर्शन के लिए शताधिक आध्‍यात्मिक संत, अनेक राजनेता तथा लाखों श्रद्धालु चन्‍द्रगिरि पहुँच गए।
आचार्य विद्यासागर जी
जन्‍म 10 अक्‍टूबर-1946, महाप्रयाण 18 अक्‍टूबर-2024
(2) दिनांक 17और18 फरवरी 2024 की अर्धरात्रि में 2.30बजे जन-जन के आराध्‍य विद्यासागर जी के महाप्रयाण से भले ही पूरे अध्‍यात्‍म जगत को असाधारण क्षति हुई तदपि विद्याधर ने विद्यासागर के पथ पर सतत चलते हुए चन्‍द्रगिरि अतिशय क्षेत्र पर समाधिमरण का परम लक्ष्‍य प्राप्‍त कर लिया। हम श्रमण परंपरा के इस ध्रुवतारे के चरणों में अपनी भावपूर्ण विनायांजलि समर्पित करते है।
(3) मध्‍यप्रदेश के सामान्‍य प्रशासन विभाग के आदेश क्रमांक एफ 8-2/2023/1-4 दिनांक 18 फरवरी, 2024 द्वारा जैन मुनि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के देहावसान पर राज्‍य शासन के द्वारा प्रदेश में दिनांक 18 फरवरी, 2024 को आधे दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया। इस दौरान राष्‍ट्रीय ध्‍वज आधा झुका रहा तथा राजकीय समारोह/कार्यक्रम आयोजित नहीं किए गए।
(4) देश के प्राय: सभी मुनिवरों ने 18 फरवरी, 2024 को उपवास किया। जैन समाज के सभी आचार्यो, मुनिवरों, हिन्‍दु समाज, राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ, सिख समाज और मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों ने उनके प्रति अपनी विनयांजलि प्रस्‍तुत कर यह सिद्ध कर दिया कि आचार्य विद्यासागर सहस्रों जैन संतों के ही नहीं अपितु देश के वरिष्‍ठतम संत रहे है। विद्यासागर जी ने सहस्रों संतों के रूप में चल तथा अनेक विशाल मंदिरों के रूप में अचल तीर्थो का निर्माण किया। देश के अनेक बुद्धिजीवियों ने इन तीर्थो के निर्माण की मुक्‍तकंठ और अश्रुपूरित नयनों से सराहना की।
(5) यह उल्‍लेखनीय है कि छत्‍तीसगढ़ राज्‍य के राजनांदगांव जिले में जिला मुख्‍यालय से 22 किलोमीटर दूर स्थित डोंगरगढ़ नगर माँ विमलेश्‍वरी देवी के लिए प्रसिद्ध है। इसी पहाड़ी के समीप स्थित चन्‍द्रगिरि पर्वत पर भगवान चन्‍द्रप्रभु मंदिर के निर्माणाधीन परिसर में ही आचार्य श्री अपने जीवन के अंतिम दिनों में विराजमान रहे। श्री स्‍वदेश उत्‍तमचन्‍द्र डोंगरगांव (अमरमौ) ने गुरुदेव के समाधिस्‍थ होने की जानकारी तुरंत ही नैनागिरि में हमें, हमारे प्राचार्य श्री सुमति प्रकाश जैन के माध्‍यम से दी। कुछ क्षण के लिए हम निशब्‍द और स्‍तब्‍ध हो गए। जैन जगत ही नहीं, बल्कि विश्‍व मानव समुदाय को अपूरणीय आध्‍यात्मिक क्षति हो गई।
(6) नैनागिरि तीर्थ पर भगवान पार्श्‍वनाथ की विशाल तदाकार मूर्ति पार्श्‍वनाथ के 73 वें महामस्‍तकाभिषेक के अवसर पर आचार्य श्री के स्‍वस्‍थ होने के लिए 17 फरवरी-2024 को प्रभु से हम सबने विशेष प्रार्थना की। रात्रि में ही आचार्य श्री देह से विदेह के पथ पर प्रस्‍थान कर गए। 18 फरवरी, 2024 को नैनागिरि तीर्थ पर आयोजित सभा में आचार्य श्री को विनयांजलियाँ प्रस्‍तुत करते समय हर आंख नम हो गई। श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए। इस सभा में मध्‍यप्रदेश उच्‍च न्‍यायालय तथा जिलों के न्‍यायाधीश, प्रदेश सरकार के प्रशासन, पुलिस, अभियांत्रिकी आदि प्राय: सभी विभागों के वरिष्‍ठतम शताधिक अधिकारियों ने अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि समर्पित की। नैनागिरि तीर्थ के अध्‍यक्ष श्री सुरेश जैन और मंत्री श्री राजेश रागी ने सशक्‍त आत्‍म बोध और लोक बोध के धनी गुरुदेव के अवदान को अपनी अश्रुपूरित भावनाओं के साथ स्‍मरण करते हुए अभिव्‍यक्‍त किया कि गत शताब्दि के सत्‍तर और अस्‍सी के दशक में उनसे प्राप्‍त आत्‍मीय स्‍नेह की विराट पूंजी हमें सदैव स्‍वस्‍थ और प्रसन्‍न रखती है।
(7) जन-जन मुख से निकलीं मन शुद्धि, वचन शुद्धि और काय शुद्धि की अनंत उद्घोषणाओं ने आचार्य श्री के प्रत्‍येक अंग और प्रत्‍यंग को पवित्र किया है। उनकी वाणी को मुखरता और पावनता प्रदान की है। नैनागिरि स्थित सिद्धशिला से मोक्ष पधारे वरदत्‍तादि मुनिवरों ने आचार्य श्री को अत्‍यधिक प्रभावित किया। भगवान पार्श्‍वनाथ की पावन रजकणों ने उन्‍हें अनुपम ऊर्जा प्रदान की। मध्‍यप्रदेश के आध्‍यात्मिक विकास के लिए उन्‍होंने अथक परिश्रम किया।गुरुदेव की दिव्‍य दृष्टि और सौम्‍य स्मित हास्‍य ने हमें और देश-विदेश में बसे हमारे पूरे परिवार को सदैव प्रभावित किया है। तत्‍कालीन न्‍यायमूर्ति विमला जैन जैसी युवतियों और अशोक पाटनी और हम जैसे प्रगतिशील युवकों को उन्‍होंने अपरिमित साहस और असाधारण आत्‍म-विश्‍वास से समृद्ध किया है। हम सबके वयस्‍क जीवन को आध्‍यात्मिकता से आपूरित किया है। इस प्रकार 45 वर्षो तक उनके साथ रहे आत्‍मीय संपर्को की स्‍मृतियाँ हमारे मन और मस्तिष्‍क में सदैव जीवंत रहेंगी।
(8) आचार्य श्री का नैनागिरि तीर्थ से विशेष लगाव रहा। परिणामत: वर्ष 1978, 1981 और 1982 में नैनागिरि में आचार्य श्री के तीन चातुर्मास हुए। दो ग्रीष्‍मकालीन और दो शीतकालीन वाचनाएं हुई। आध्‍यात्मिक समृद्धि के इन सात सौ दिनों के अमृतकाल में आचार्य श्री के संघस्‍थ साधुओं की संख्‍या में 15 गुनी वृद्धि हुई। उनकी प्रेरणा से अस्‍सी के दशक में नैनागिरि के महावीर सरोवर में विशाल समवसरण मंदिर का निर्माण हुआ और उनके ही सान्निध्‍य में वर्ष 1987 में इस मंदिर में विराजमान भगवान पार्श्‍वनाथ की चार विशाल प्रतिमाओं की प्रतिष्‍ठा संपन्‍न हुई।
(9) नैनागिरि के इसी पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव के अवसर पर 11 फरवरी 1987 को गुरुदेव ने देश की 9 भाषाओं में अनुवादित अपने विश्‍व प्रसिद्ध मूकमाटी महाकाव्य का समापन किया। इस संबंध में आचार्य श्री की निम्नांकित पंक्तियां सतत पठनीय और स्‍मरणीय है–
‘’मढ़िया जी (जबलपुर) में द्वितीय वाचना का काल था। सृजन का अथ हुआ और नयनाभिराम-नयनागिरि में पूर्ण पथ हुआ। समवसरण मंदिर बना, जब गजरथ हुआ।‘’
(10) नैनागिरि में प्रवेश के अवसर पर सन् 1978 में आचार्य श्री के तीन शिष्य थे। तीव्र गति से बढ़ते हुये शिष्यों / शिष्याओं की संख्या 1987 में 45 हो गई। नैनागिरि में ही 1987 में 11 आर्यिकाओं और 12 क्षुल्लकों की दीक्षा संपन्न हुई। देश में इतनी बड़ी संख्या में सर्वप्रथम आर्यिका दीक्षा हुई। इस प्रकार प्रथम दशक (1978 से 1987 की अवधि में) संघस्थ संतों की सदस्य संख्या में 15 गुनी वृद्धि हो गई।
(11) गत शताब्दि के सातवें और आठवें दशक में नैनागिरि में विराजमान रहते हुए आचार्य श्री के आध्‍यात्मिक व्‍यक्तित्‍व ने तेजी से हिमालयीन ऊँचाई प्राप्‍त की। पूरे बुन्‍देलखण्‍ड में आध्‍यात्मिक क्रांति ने जन्‍म लिया। आचार्य पुष्‍पदंतसागर, उपाध्‍याय गुप्तिसागर, मुनिवर क्षमासागरतथामुनिवर सुधासागर आदि संतों ने नैनागिरि में दीक्षा प्राप्‍त कर अपने आचार्य को सर्वोच्‍च ऊँचाई प्रदान की। सहस्रों युवक-युवतियाँ ने मोक्ष पर आगे बढ़ने के व्रत लिए। नैनागिरि में सांस्‍कृतिक संस्‍कारों की धारा तीव्र गति से निकली और पूरे राष्‍ट्र में प्रवाहित हुई। यहाँ जन्‍में संतों की आध्‍यात्मिक ऊर्जा पूरे देश में उद्घाटित हुई। सर्वत्र विकीर्ण हुई।
(12) आचार्य श्री की प्रेरणा से पूरे देश में 57 विशाल मंदिरों का निर्माण और पंचकल्‍याणक संपन्‍न हुए। इनमें से नैनागिरि का समवसरण मंदिर, कुण्‍डलपुर का सहस्रकूट मंदिर, इन्‍दौर, भोपाल, नेमावर और अमरकण्‍टक के विशाल मंदिर की चर्चा पूरे विश्‍व में की जाती है। सागर में भाग्‍योदय चिकित्‍सालय, जबलपुर में पूर्णायु आयुर्वेदिक कॉलेज स्‍थापित हुआ। 120 से अधिक गौशालाएं स्‍थापित हुई, जिनके द्वारा हजारो गायों की रक्षा हो रही है।
(13) पूज्‍य विद्यासागर जी की अनुकंपा से बालिकाओें को गुणवत्‍तापूर्ण शिक्षा देने के उद्देश्‍य से देश के इन्‍दौर, जबलपुर, टीकमगढ़, डोंगरगढ़ और ललितपुर में प्रतिभास्‍थली स्‍थापित की गई।जिनके द्वारा सहस्रों बालिकाओ को संस्कारित, शिक्षित और प्रशिक्षित किया जा रहा है। प्रदेश की जेलों में संस्‍थापित हाथकरघा केन्‍द्रों से सैकड़ों कैदियों को नई जिन्‍दगी मिली।
(14) आचार्य विद्यासागर जी संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, मराठी और कन्नड़ के विद्वान रहे हैं। उन्होंने हिन्दी और संस्कृत में अनेक रचनाएँ की हैं। सौ से अधिक शोधार्थियों ने उनके साहित्‍य का अध्ययन कर मास्टर्स और पीएच.डीकी उपाधियाँ प्राप्‍त की। आचार्य विद्यासागर जी के शिष्य मुनि क्षमासागर जी ने उन पर आत्मान्वेषी जीवनी लिखी है। आचार्य श्री की दीक्षा के दुर्लभ मूल चित्र विदेश से लाकर इस जीवनी में सर्वप्रथम प्रकाशित कराने का हमें परम सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ है। इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद भी भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित हो चुका है।मुनि प्रणम्यसागर जी ने उनके जीवन पर अनासक्त महायोगी नामक काव्य की रचना की है।
(15) भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी सहित शताधिक नेताओं ने आचार्य श्री के असाधारण अवदान का स्‍मरण किया। मोदी जी नई द‍िल्ली में आयोज‍ित भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में जैन आचार्य विद्यासागर को याद कर भावुक हो गए।उन्‍होंने समस्त देशवासियों की ओर से श्रद्धाऔर आदरपूर्वक नमन करते हुए विनयांजलि प्रदान की। पूरे देश तथा प्रदेश के जैन समाज के व्‍यवसायियों ने अपने व्‍यापारिक प्रतिष्‍ठान बंद रखे।
(16) यह अत्‍यधिक सराहनीय है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी द्वारा आचार्य श्री के अवदान पर लिखित अत्‍यंत सामयिक लेख ‘’सम्‍यक ज्ञान, दर्शन और चरित्र की त्रिवेणी’’शीर्षक से दैनिक भास्‍कर में, ‘’जीवन का हर अध्‍याय अद्भुत ज्ञान, असीम करुणा और मानवता के उत्‍थान की प्रतिबद्धता से सुशोभित रहा’’शीर्षक से पत्रिका में, ‘’हमने एक अद्भुत मार्गदर्शक खो दिया है’’शीर्षक से पीपुल्‍स समाचार में तथा ‘’राष्‍ट्र हित की सोचते थे आचार्य श्री’’ राज एक्‍सप्रेस में दिनांक 21 फरवरी, 2024को प्रकाशित किया गया। इस लेख के माध्‍यम से श्री मोदी जी ने आने वाली पीढि़यों से आग्रह किया कि राष्‍ट्र निर्माण के प्रति आचार्य श्री की प्रतिबद्धता ओर पक्षपात विहीन विचारों का व्‍यापक अध्‍ययन करें।
(17) मध्‍यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपनी शोक संवेदना व्यक्त की। मंत्री श्री चैतन्य काश्यप ने 18 फरवरी, 2024 को आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की अंतिम यात्रा में शामिल होकर मध्यप्रदेश सरकार की ओर से श्रद्धांजलि दी। मंत्री श्री उदय प्रताप सिंह ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर का आदर्शपूर्ण जीवन हम सबको निरंतर सच्‍चे मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करता रहेगा।
(18) विद्यासागर जी का जन्म 10 अक्टूबर 1946 को विद्याधर के रूप में कर्नाटक के बेलगाँव जिले के सदलगा में शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। आचार्य शांतिसागर जी के शिष्य आचार्य ज्ञानसागर ने विद्यासागर जी को 30 जून 1968 में अजमेर में 22 वर्ष की आयु में दीक्षा दी और 22 नवम्बर 1972 को आचार्य पद प्रदान किया गया। वे पूरे भारत में ऐसे विरले आचार्य है जिनका पूरा परिवार ही संयम के साथ मोक्षमार्ग पर चल रहा है। उनके गृहस्‍थ जीवन तथा आध्‍यात्मिक जीवन के वृहत परिवार के सभी मुनिवरों एवं आर्यिकाओं को शत-शत वंदन।
(19) आचार्य समयसागर जी के चरणों में अनंत प्रणाम करते हुए उनसे प्रार्थना है कि वे पारस रज और अपने गुरुवर की पावन पगतलियों से पवित्र पथ पर चलते हुए नैनागिरि की सिद्धशिला पर बैठकर तपस्‍या करें और सिद्धत्‍व के पथ पर अपने यश और कीर्ति की पताका पूरे विश्‍व में लहराते रहें।

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