आत्मा का ज्ञान होना सबसे आवश्यक है -आचार्य देव श्री नयचंद्रसागर सूरीश्वर जी म.सा.

रतलाम, 24 जुलाई। अगर हम आत्मा को नहीं समझे तो इस जगत में कुछ नहीं होगा। आत्मा को समझना बहुत जरूरी है। आचारांग सूत्र में इसीलिए सबसे पहले आत्मा की बात कही गई है। कल्पना कीजिए कि आत्मा इस जगत में नहीं है तो क्या होगा। संसार में सुख-दुख, पुण्य और पाप का अनुभव जीव ही करता है।
यह बात सैलाना वालों की हवेली मोहन टॉकीज में चल रही प्रवचन श्रृंखला में वर्धमान तपोनिधि पूज्य आचार्य देव श्री नयचंद्रसागर सूरीश्वर जी म.सा. ने आचारांग सूत्र में आत्मा को परिभाषित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि जब तक आत्मा का ज्ञान नहीं होगा, तब तक जन्म-मरण की परंपरा टूटने वाली नहीं है। यदि आत्मा नहीं,तो कुछ नहीं है। आगम शब्द में भी “आ से आत्मा और गम यानी जानना” है।
गणिवर्य डॉ. अजीत चंद्र सागर जी म.सा. ने कहा कि हम खुली आंखों से जो देखते हैं और आंख बंद होने पर जो सपने देखते हैं उन दोनों में एक समानता है। इसमें आत्मा का बोध होता है। जगत में कई जीव हैं,जिन्हें आत्मा का बोध है, लेकिन कई को नहीं भी है। हमें अपनी आत्मा से पांच सवाल रोज सुबह पूजा करके पूछना चाहिए-मैं कौन हूं, मैं कहां से आया हूं, मुझे कहां जाना है, मुझे क्या करना है और मैं क्या कर रहा हूं।
गणिवर्य डॉ. अजीत चंद्र सागर जी म.सा. ने कहा कि यदि भगवान की पूजा करने के बाद भी आपका मन नहीं बदलता है तो आपकी पूजा में कहीं कोई कमी है, वरना मन प्रसन्नचित होता है। आत्मा है यह हमें महसूस नहीं होता लेकिन जिस दिन हमने उसके बारे में सोचना शुरू कर दिया आत्मज्ञान हो जाएगा। श्री देवसुर तपागच्छ चारथुई जैन श्री संघ गुजराती उपाश्रय रतलाम एवं श्री ऋषभदेव जी केसरीमल जी जैन श्वेतांबर पेढ़ी रतलाम के तत्वावधान में आयोजित प्रवचन श्रृंखला में बड़ी संख्या में श्रावक, श्राविकाएं उपस्थित रहे।

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