“संयोग और वियोग “कर्म की धरोहर है” सुःख और दुःख क्षणभंगुर तथा नश्वर है ऐसी आध्यात्मिक दृष्टि रखने वाला व्यक्ती कभी विचलित नहीं होता – मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज

इंदौर। “संयोग और वियोग “कर्म की धरोहर है” सुःख और दुःख क्षणभंगुर,तथा नश्वर है ऐसीआध्यात्मिक दृष्टि रखने वाला व्यक्ती कभी विचलित नहीं होता है । उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने मोदीजी की नसिया में प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किये”।
मुनि श्री ने कहा कि आचार्य गुरुदेव कहते हें कि दुःख आये तो उसे कर्म काटने का निमित्त मानो” उन्होंने कर्म की व्याख्या करते हुये कहा कि हमारे जीवन में कभी एकरुपता नहीं रहती कभी हम खुश रहते है तो कभी हम खिन्न हो जाते है कयी बार हमें शांती रहती है,तो कई बार अशांति आ जाती है कयी क्षणों में हमें फक्र महसूस होता है तो कभी हम फिक्र में डूव जाते है, कभीआनंद तो कभी अवसाद, कभी आशा तो कभी निराशा,कभी सुःख तो कभी दुःख, कभी शांति कभी अशांति जो कुछ भी घट रहा है वह मात्र महज संयोग है तथा”कर्म की धरोहर है”जो पाया है वह भी तेरा नहीं जो खोया है वह भी तेरा नहीं,ऐसी आध्यात्मिक दृष्टि मानकर चलोगे तो पाने में सुख और खोने में दुःख महसूस नहीं होगा।
उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि कई बार जब रेल में लम्वी यात्रा होती है तो यात्रीओं में आत्मीय लगाव हो जाता है लेकिन गंतव्य स्थान आते ही वाय करके चले जाते है,न तो मिलने का हर्ष होता है,और न विछोह का वियोग होता है। मुनि श्री ने कहा कि “जीवन का हर संयोग वियोग मय है, जो आया है तो वह जाऐगा” जो इस सत्य को जो पहचान लेता है वह कभी मिलने अथवा विछुड़ने पर विचलित नहीं होता, धर्म हमें ऐसी ही समझ प्रदान करता है उन्होंने 1993 की एक घटना सुनाते हुये कहा कि गोमटेश बाहुबली में सत्ताईस साल का बेटा जो कि अपनी सेबाऐं देंने गया था अचानक एक दुर्घटना घटी और उसका देहांत हो गया वह एक मां का इकलौता बेटा था जब उसे यह समाचार मिला तो वह विल्कुल भी विचलित नहीं हुई वह तत्वज्ञानी थी उसने कहा कि जो आया है,वह तो जाऐगा ही उसका और मेरा महज इतने दिन का ही संयोग था मुझे खुशी है कि वह प्रभु के चरणों में सेवा करते हुये गया।यह एक आध्यात्मिक दृष्टि है।दूसरा उदाहरण उन्होंने एक सेठजी का दिया सेठजी का देश विदेश में लम्वा कारोबार था वह स्वाध्यायी एवं तत्वदृष्टी थे उनके पास एक दिन संदेश बाहक कर्मचारी आया और वह दुखित होकर बोला कि सेठजी अपना जो जहाज माल लेकर आने बाला था वह डूब गया है लगभग पांच करोड़ का नुकसान हुआ है, सेठजी ने सुना और उसको कहा जाओ अपना काम करो यही “विधी की मर्जी” है और वह संदेश वाहक चला गया दो दिन बाद फिर वही व्यक्ती आया उसने कहा सेठजी जो मेंने कल आपको जानकारी दी थी वह गलत थी अपना माल उस जहाज में नहीं था वह दो दिन बाद निकला और सकुशल बंदरगाह पर आ गया है और मार्केट में तेजी आने के कारण हमें लगभग दस करोड़ का फायदा होगा सेठ सहाब ने कहा कि जाओ यह विधी की मर्जी है। तब आगन्तुक को बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने सेठजी से पूंछा कि आपको कल सूचना मिली कि पांच करोड़ का नुकसान हुआ तब आपने कहा कि “विधी की मर्जी” और आज दस करोड़ का फायदा की सूचना मिली तो भी आपने कहा “विधी की मर्जी” आखिर इतनी स्थिरता आप में कंहा से आई? सेठजी ने उत्तर देते हुये कहा कि कोई व्यक्ति बेंक में रुपया जमा करता है या रुपया निकालता है तो बेंक के केशियर पर कोई फर्क पड़ता है? तो आगंतुक ने जबाव दिया नहीं.. तो में भी अपने आपको “कर्म” का प्रवंधक मानता हुं,यह उसी की धरोहर है,जब उसकी इच्छा होती ले लेता है और जब उसकी इच्छा होती है दे देता है। जो व्यक्ति इतनी समता रखता है,और नफा नुकसान को विधी की मर्जी मानता है वह खुश रहेगा या दुःखी? मुनि श्री ने कहा यह अनूकूलता और प्रतिकूलता दोंनों ही क्षण भंगुर है यह तो “कर्म की धरोहर है” जिस दिन आपकी दृष्टि इस ओर हो जाऐगी उस दिन से न तो आपको आने की खुशी होगी और न जाने का दुःख होगा न किसी से मिलने पर आसक्ती होगी न विछुड़ने पर दुःख होगा न प्रशंसा करने पर फक्र होगा और न अपमान करने पर क्रोध आऐगा मुनि श्री ने कहा कि आध्यात्म हर स्थिति में हमें स्थिरता प्रदान करता है। मुनि श्री ने कहा संयोग- वियोग “कर्म की धरोहर है” कर्म कहता है तुम इसका उपयोग करो मिस यूज मत करना यदि मिस यूज करोगे तो हम एक झटके में ओन लाईन ट्रांसफर कर देंगे जो इस सत्य को पहचान लेता है वह कभी विचलित नहीं होता जो पाया है वह भी तेरा नहीं जो खोया है वह भी तेरा नहीं अपने आपको आनंद से भरकर जीना चाहते हो तो हर स्थिति में सदाबहार प्रसन्न रहना सीखो यह हमारा धर्म ही है जो हमें सिखाता है बाहर से चाहे जैसे संयोग बने लेकिन अंदर से हम प्रसन्न और आनंदित तथा शांतिमय बने रहे।इस अवसर पर मुनि श्री निर्वेगसागर जी महाराज तथा मुनि श्री संधान सागर महाराज तथा संघस्थ क्षुल्लक गण मंचासीन रहे। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कार्यक्रम के शुभारंभ में आचार्य श्री के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन जयपुर से पधारे बास्तुविज्ञ सतीश शर्मा तथा श्री दि. जैन पंच लश्करी गोठ टृस्टी योगेंद्र जी काला हेमन्त जी सेठी,कमल काला नीरज मोदी,पारस पांड्या जयदीप जैन आदि ने किया तथा मुनिसंघ को श्रद्धालुओं ने शास्त्र भेंट किये।

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