जनवादी लेखक संघ द्वारा संगोष्ठी आयोजित



रतलाम । भगतसिंह का स्पष्ट दृष्टिकोण और वैज्ञानिक सोच आज के समय की आवश्यकता है। भगत सिंह ने समन्वय, सौहार्द्र और समरसता की बात कही थी । वे ऐसे भारत के पक्षधर थे जहां सामाजिक, धार्मिक एकता और आर्थिक समानता हो । उनके इन्हीं विचारों को आगे बढ़ना ज़रूरी है। आज के वातावरण में इन सब मूल्यों को विस्मृत किया जा रहा है , जो दुखद है ।
उक्त विचार वरिष्ठ कवि एवं अनुवादक प्रो. रतन चौहान ने जनवादी लेखक संघ द्वारा शहीद भगत सिंह के शहादत दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किए । उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक परिदृश्य और आर्थिक परिदृश्य एक साथ गति करते हैं । जिस देश में सांस्कृतिक मूल्यों को ध्वस्त किया जाता है वहां आर्थिक प्रगति की उम्मीद नहीं की जा सकती । भगत सिंह इन दोनों बिंदुओं पर गंभीरता से अपनी बात रखते रहे । उन्होंने नास्तिक होने की बात कही लेकिन उनका नास्तिक होना भी धर्म की वैज्ञानिक समझ को अभिव्यक्त करता है।
वरिष्ठ रंगकर्मी कैलाश व्यास ने कहा कि भगत सिंह का अंग्रेजों के प्रति विद्रोह भारतीय अस्मिता पर प्रहार का जवाब था । साइमन कमीशन में अंग्रेज़ों का वर्चस्व और लाला लाजपत राय पर हुए हमले के पश्चात उनकी मृत्यु से व्यथित होकर भगत सिंह ,सुखदेव और राजगुरु ने अन्याय के विरुद्ध अपने विद्रोह का शंखनाद किया। रंगकर्मी यूसुफ़ जावेदी ने कहा कि दीपक जब कभी जलता है तो प्रकाश फैलाता ही है । अन्याय और अत्याचार चाहे जितना हो लेकिन एक दिन नई सुबह होती ही है ।भगतसिंह ने हर वक़्त अपने मूल्यों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी ।
भगतसिंह की पत्रकारिता पर पुस्तक “समर में शब्द” के लेखक आशीष दशोत्तर ने कहा कि भगत सिंह के जीवन के कई आयाम हैं । उनका साहित्य सृजन , पत्रकारिता और जीवन दर्शन हमारी लोक गाथाओं में शामिल होना चाहिए । जब तक भगत सिंह के सही स्वरूप को लोक जीवन में नहीं पहुंचाया जाएगा तब तक अवसरवादी ताकतें उनके विकृत स्वरूप को फैलाती रहेंगी । संगोष्ठी के मुख्य वक्ता जितेंद्र सिंह पथिक ने अपना पर्चा पढ़ते हुए कहा कि भगत सिंह बहुत छोटी उम्र में बड़ा काम करने वाले व्यक्ति थे । वे अपने परिवेश को समृद्ध बनाना चाहते थे । सामाजिक एकता लाना चाहते थे। फ़िल्म समीक्षक जुबेर आलम कुरेशी ने कहा कि नई पीढ़ी में भगत सिंह के संस्कारों को डालना बहुत ज़रूरी है । आज की पीढ़ी साहित्य से पूरी तरह विमुख हो चुकी है और मोबाइल से अपना जीवन बर्बाद कर रही है। ऐसे में भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के साहित्य से उन्हें जोड़ना बहुत आवश्यक है।
जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष रणजीत सिंह राठौर ने कहा कि भगत सिंह के वैचारिक पक्ष को रतलाम में सदैव शिद्दत से याद किया जाता रहा है और बाहर से आने वाले विद्वान भी भगत सिंह के प्रति चेतना को यहां देखकर अभिभूत होते हैं । अध्यक्षता करते हुए मांगीलाल नगावत ने कहा की भगतसिंह हर दौर में पैदा होते हैं लेकिन साहस और अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ता कोई कोई ही दिखा पाता है । भगतसिंह ने अपने छोटे से जीवन में बहुत बड़ी लकीर खींची जिसकी सारी दुनिया आज भी अपने तरीके से व्याख्या करने में लगी हुई है। कार्यक्रम का संचालन यूसुफ़ जावेदी ने किया और आभार रणजीत सिंह राठौर ने व्यक्त किया।
रतलाम साहित्यकार दूरभाष निर्देशिका का विमोचन
संगोष्ठी में रतलाम के साहित्यकारों के दूरभाष नंबर को समाहित करती ” रतलाम साहित्यकार दूरभाष निर्देशिका ” का विमोचन किया गया । दूरभाष निर्देशिका डॉ. कैप्टन एन.के. शाह द्वारा प्रकाशित की गई है । डॉ. शाह ने उपस्थितजनों को विमोचन के उपरांत दूरभाष निर्देशिका भेंट की। इस निर्देशिका में रतलाम के 160 साहित्यकारों के दूरभाष क्रमांक सम्मिलित हैं। उपस्थितजनों ने डॉ. शाह के प्रयास की सराहना की तथा इसे रतलाम के लिए महत्वपूर्ण निरूपित किया।
इनकी उपस्थिति रही
कार्यक्रम में डॉ. खुशाल सिंह पुरोहित, डॉ . हरिकृष्ण बड़ोदिया, प्रणयेश जैन, विनोद झालानी , गजेंद्र सिंह राठौर, ब्रजराज ब्रज , डॉ. शोभना तिवारी , लक्ष्मण पाठक, नरेंद्र सिंह डोडिया , गजेंद्र सिंह चौहान, सुभाष यादव , अखिल स्नेही, प्रकाश हेमावत , आशा श्रीवास्तव , नरेंद्र सिंह डोडिया , डॉ. दिनेश तिवारी , सत्यनारायण सोढ़ा , जुझार सिंह भाटी , आई. एल. पुरोहित, शिवराज जोशी , रामचंद्र फुहार , जीएस खींची , जवेरीलाल गोयल , दिलीप जोशी , एस.के. मिश्रा , हरिशंकर भटनागर , गीता राठौर , कला डामोर, मुकेश सोनी, कैलाश वशिष्ठ सहित सुधिजन मौजूद थे।