धार्मिक कट्टरपंथियों पर प्रहार करती श्री आशीष दशोत्तर की कहानी- गिंडोले

समीक्षा- नरेन्द्रसिंह पॅंवार (गढ़ी भैंसोला)

रतलाम। गिंडोल कहानी वरिष्ठ साहित्यकार श्री आशीष दशोत्तर द्वारा लिखित वर्तमान परिवेश को यथार्थ रूप में व्यक्त करती हुई एक लम्बी कहानी है। गिंडोले कहानी की कथानक और चरित्र चित्रण कहीं भी आपको अवास्तविक नहीं लगेगा। आशीष दशोत्तर ने संपूर्ण कथानक इस प्रकार बुना है कि लगता है कि अपने आसपास के किसी मोहल्ले की घटना है ।
कहानी का शीर्षक बहुत महत्त्वपूर्ण होता है जोकि पूरी कहानी के कथानक और घटनाक्रम को स्पष्ट करने की क्षमता रखता है।
आलोच्य कहानी का शीर्षक भी अपने आप में बहुत ही सार्थक और सटीक है। ‘गिंडोले’ नाम ही पाठक को कहानी पढ़ने के उद्वेलित कर देता है। गिंडोले नाम पढ़ते या सुनते ही पाठक सोचने पर विवश हो जाता है कि आखिर ये गिंडोले क्या है ? इन हिंडोलों से कहानी क्या वास्ता है ? इन सभी प्रश्नों के जवाब शनैः शनै कहानी को आगे पढ़ने पर खुलते जाते हैं। आशीष दशोत्तर की यह कहानी धार्मिक कट्टरता से लड़ने वाले उस प्रगतिशील नायक निसार खान ‘निर्भीक’ की कथा है । निसार परिवेश में व्याप्त अंधविश्वास की हद तक पहुंच गई धार्मिक कट्टरता का मखौल उड़ाते हुए धर्म के खोखलेपन को उजागर करता है।
गिंडोले कहानी का प्रारंभ चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ कि तरह परिवेश को उभारते हुए होता है। यथा घर से पचास कदम की दूरी पर ही मस्जिद के सामने कभी उसे इस कदर लेटा रहना पड़ेगा, इसकी कल्पना उसने शायद कभी नहीं की होगी। कभी उसकी ऐसी इच्छा भी नहीं थी। वह तो जीते जी इस मस्जिद में कभी नहीं गया। अंदर जाना तो छोड़िये, इस मस्जिद के सामने कभी बैठा भी नहीं। इधर से जब भी गुजरता मुस्कुराता हुआ गुजरता। मस्जिद में आते लोगों के चेहरे पढ़ता और फिर जोर से ठहाका लगाता।
ये पंक्तियाँ जहाँ एक ओर परिवेश को तो व्यक्त करती है वहीं दूसरी ओर मुख्य पात्र निसार की चारित्रिक विशेषताओं को भी उजागर करती है। पाठक कहानी को आगे पढ़ता है तो कहानी के मुख्य पात्र निशार खान ‘निर्भीक’ के व्यक्तित्व से परिचित होता है।
निसार खान की मृत्यु हो चूंकि है, वह जनाजे में लेटा है ।
उसकी मृत्यु के पश्चात् मुस्लिम रीतिरिवाज के अनुसार पढ़ी जाने वाली आखिरी नवाज को लेकर जद्दोजहद हो रही है। मौलवी साहब अड़ जाते है कि वे निसार के जनाजे पर आखिरी नवाज नहीं पढ़ेंगे क्योंकि _यह इंसान खुदा के हुक्म की तामील करने वाला नहीं था।
कहानी के तत्व में मूलभूत घटक है उसका कथानक होता है जो कहानी को प्रभावशाली बनाने के साथ-साथ कहानी को आगे बढ़ाता है। गिंडोले कहानी का कथानक पर विचार करे तो स्पष्ट होता है कि कथानक बहुत ही महीन तरीके से बुना गया है। गिंडोले का प्रारंभिक भाग ही हमें आसपास के परिवेश, पात्र की प्रकृति, उसकी वैचारिकता से हमें परिचित करवाता है। गिंडोले के परिवेश की बात करे तो पूरा कथानक धार्मिक कट्टरता और दो सम्प्रदायों के मध्य व्याप्त तनाव को रेखांकित करता है। धार्मिक कट्टरता के साथ-साथ साम्प्रदायिक तनाव भी क्षेत्र में व्याप्त है। कथानक जहाँ से आगे बढ़ता है उस क्षेत्र के लोग कट्टर किस्म के हैं। मुस्लिम बहुल इलाका है, जिसके दोनों छोर पर हिन्दू बसते हैं। लेखक स्पष्ट करता चलता है कि इस क्षेत्र में सबकुछ सामान्य नहीं है, तनाव बराबर बना रहता है। ऐसे प्रतिकूल परिवेश में निसार निर्भीक जैसे पात्र के माध्यक से कहानी आगे बढ़ती है। पूरी कहानी निसार और वर्तमान परिदृश्य के बीच में टकराव की कथा है। जहाँ एक और कट्टरपंथी लोग दो सम्प्रदायों के मध्य सोहार्द बिगाड़ने पर तुल रहते हैं तो दूसरी तरफ निसार निर्भीक जैसे व्यक्ति भी है जो कट्टरपंथी ताकतों को आड़े हाथों लेते है, वह ज्ञानी तो था ही फितरती भी था। उसे कट्टर किस्म के लोगों को चिढ़ाने में मजा आता था। दरअसल वह चाहता था कि लोग मजहब के महत्व को समझें।.. वह अक्सर ऐसे लोगों को अपने शब्दों से घायल करता रहता था। धर्मांध लोगों को छकाने में उसे मजा आता था।
कहानीकार केवल मुस्लिम कट्टरपंथियों को आड़े हाथों नहीं लेता है बल्कि वह ढकोसलेबाज हिन्दूओं को भी नहीं छोड़ता है। कहानी में एक जगह आती है कि धर्म के नाम पर उन्माद वाले उसकी नजर से नहीं बचते। धर्म के नाम पर सड़क रोकने और प्रदर्शन करने वाले लोगो से वह (निसार) कहता, यह धर्म नहीं, अधर्म है। जिस जगह तुम नहीं बैठ सकते वहाँ अपने भगवान को बैठाते हो ? लेखक की नजर से धर्म के नाम पर सड़क पर होने वाले अतिक्रमण और प्रवचन पांडाल भी नहीं बचते हैं। साथ ही वो लोग भी नहीं बचते हैं जो गलत को गलत नहीं कह सकते हैं और गलत को रोकते भी नहीं है। यथा- जब गलत बात बात है और उसे महसूस भी कर रहे हो तो रोकते क्यों नहीं ? प्रवचन के पांडाल सड़क पर बनने से जितना धर्म लाभ सुनने वालों को नहीं होता, उससे अधिक पीड़ा तो उस मार्ग से गुजरने वालों को होती है।
कहानी आगे बढ़ती जाती है और परिवेश में व्याप्त तनाव और जटिलताएँ भी बढ़ती जाती है, छोटी-छोटी घटनाएँ किस प्रकार बढ़ा रूप ग्रहण कर लेती है उसका संघर्ष सामने आता है और कहानी अपनी चरम की ओर पहुँचती है। कहानी का मुख्य पात्र निशार तो मृत्यु को प्राप्त हो चुका है लेकिन फिर भी वो अपने परिवेश में वैचारिक रुप में जिन्दा रहता है, वो लगातार परिवेश में व्याप्त कट्टरपंथी ताकतों से संघर्ष करता है। गिंडोले कहानी में जब मौलवी साहब निसार की मौत पर आखिरी नवाज पढ़ने से मना कर देते हैं तो एक व्यक्ति भीड़ में से बोल उठता है कि चलिए इसे हम आग के हवाले कर देते हैं। यह कहानी का चरम बिन्दु था, इसके बाद मौलवी साहब तैयार हो जाते है और कहानी अपने अंत की ओर बढ़ती है। अंततः मौलवी साहब मान जाते हैं और संघर्ष का समाधान सामने आता है।
कहानी का मुख्य पात्र या नायक वैसे तो निसार ही है लेकिन सहायक पात्र के रुप में मौलवी साहब और कुछ लोग भीड़ के रूप में सामने आते हैं। गिंडोले कहानी में खलनायक के रुप में कट्टरपंथी लोग है, जिनसे निसार ताउम्र संघर्ष करता रहता है और मृत्यु के उपरांत भी यह संघर्ष समाप्त नहीं होता है। अंत में मौलवी साहब तैयार हो जाते और कहानी का सुखांत अंत हो जाता है लेकिन समाज में उपस्थित कट्टरपंथी, सांप्रदायिक ताकते सदैव समाज पर हावी रहती है। वो हमेशा किसी न किसी रूप में जिन्दा रहती है। गिंडोले कहानी भी इस बात की ओर संकेत करती है… कहने का निस्सार का किस्सा यहाँ तमाम होता है। मगर खत्म होकर भी रुदादे-निसार कभी खत्म होती है भला ? यह और फैलती ही जाती है। जिन्दगी से मौत बीच हर कहीं कितने ही निसार ऐसे ही पड़े हुए है। उनके पास ऐसे कितने ही गिंडोले रंग रहे हैं।
किसी भी कहानी को उसकी भाषा-शैली और उसके संवाद प्रभावी बनाते हैं। गिंडोले कहानी की भाषा पर विचार करें तो इसकी भापा पात्रानुकूल और परिवेश को पूरी शिद्दत से उभारती है। भाषा कहीं भी पात्रों का साथ नहीं छोड़ती है। चूकि मुख्य पात्र और परिवेश मुस्लिम संस्कृति से सरोकार रखता है तो उसके संवादों में उर्दू मिश्रित हिन्दी का उपयोग हुआ है। परिवेश को यथार्थ स्वरुप में प्रदान करने के लिए शेर और शायरी का भी लेखक ने बखूबी उपयोग किया है।
इस प्रकार गिंडोले कहानी अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में पूर्ण सफल रही है। समाज में व्याप्त कट्टरपंथी लोग हमेशा सामाजिक सोहार्द बिगाड़ने के लिये तैयार रहते हैं। ये कट्टपंथी लोग सभी धर्मों में अपनी पेठ बनाये हुए हैं और मौके की तलाश में रहते हैं। इन कट्टरपंथियों का कोई इमान या धर्म नहीं होता है इसलिए इन्हें गिंडोले से परिभाषित किया गया है। गिंडोले जिनकी न तो रीढ़ की हड्डी होती है और नहीं स्वाभिमान होता है। ये समय आने पर दोनों दोनों तरफ चल देते हैं।
इस प्रकार कहानीकार श्री आशीष दशोत्तर ने गिंडोले कहानी के माध्यम से समाज में व्याप्त विद्रूपताओं, दो सम्प्रदायों के मध्य व्याप्त तनाव एवं धार्मिक कट्टरता को यथार्थ रुप में प्रस्तुत करने में सफलता प्राप्त की है। आशीष दशोत्तर ने कविता, गजल, व्यग्यं, नाटक जैसी साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर समान रूप से लेखनी चलाई है। गिंडोले कहानी श्री दशोत्तर की वर्तमान दौर की महत्वपूर्ण कहानी है जो हमें विचार करने पर मजबूर करती है।

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