स्मृति शेष – प्रो. अजहर जी हाशमी

यादों के झरोखे से

जिंदगी बड़े रंग दिखाती है।मौसम की तरह लोग बदलते हैं और इन दिनों तो मौसम का कोई भरोसा ही नहीं रहा।पल में तौला ,पल में माशा।उतार चढ़ाव न हो जिंदगी तो फिर उसके मायने ही क्या, सपाट सड़क सी जिंदगी , वही हर रोज की सुबह और शाम, बितती रात और फिर वही सुबह, सूरज का आगाज।मगर इसके दरमियान बहुत कुछ है जो जिंदगी को और हर दिन को उलझाए रखता है।इतना ज्यादा उलझाए रखता है कि वक्त की ,घड़ी की सुइयां कब दिन पूरा कर देती है,कुछ पता ही नहीं चलता और एक अदद दिन नप जाता है और जिंदगी का एक दिन इतिहास बन बीत जाता है, समय सदा जवान रहता है और आदमी एक एक दिन बूढ़ा होता जाता है।इस एक दिन में बुद्ध हर पल को शुद्ध और सार्थक करता है, वह पल प्रतिपल गुनता है ,बुद्धि से शुद्धि रचता है और शब्द को पिरोता है एक समूह में माला बनाता है ,एक नई रचना रचता है,जैसे ब्रह्मा सर्जक बन मानव की सृष्टि रचता है ,वैसे ही बुद्धि की ,शब्दों की , साहित्य की रचना करने वाला , मां शारदा का सेवक , शब्दों की जुगाली नहीं करता वरन उनका सृजनधर्मिता से प्राशन करता है और नित नव सृजन कर ,सृजन सरिता का निर्माण कर साहित्य की नदी का निर्माण करता है, वह हिमालय बन जाता है,जहां से एक नई गंगा निकलती है, वह अमरकंटक बन जाता है जहां से नर्मदा की निर्मल जलधार निकलती है, विपरीत दिशा में बहकर भी वह नदी सर्वोत्कृष्ट और परम पूजनीय बन जाती है और कलियुग में भी सदा नीरा और सबसे स्वच्छ धारा धरा पर बहाती है।जब विपरीत दिशा हो तब सामान्यतः दशा खराब होती है मगर आड़े समय में यही विपरीत चलने का धर्म पथ प्रदर्शक और अपने समय का प्रकाश स्तंभ बनता है जो भटके हुए महाकाय जहाजों को रास्ता दिखाता है और इतिहास रचता है।
यह सब उपरोक्त कही गई बातें और मानव प्रकृति से प्रकृति तक के सफर का मानवीकरण किया जाए तो एक ही नाम सामने आता है, वह ब्रह्मा,वह बुद्ध, वह सर्जक है श्रद्धेय या कहें परम श्रद्धेय प्रोफेसर अजहर जी हाशमी, जो कि रतलाम के पर्याय हैं और रतलाम उनसे धड़कता है, वह तपस्वी हैं जिन्होंने रतलाम को अपनी तपोभूमि बनाकर सिद्ध कर दिया है।रतलामी जीवन का आचार और व्यवहार यूं तो रतलामी सेंव से कम नहीं होता मगर इस एक अजर अमर तपस्वी ने उसमें मृदुता घोल दी है, एक मिठास उनकी वाणी से झरता है और सेंव का रतलामीपन मालवा के मिठास में ढ़ल जाता है।
लंबे समय से मेरे परिवार के साथ उनका गहरा जुड़ाव रहा, पिताश्री प्रोफेसर छोगमल जी जैन ,हाशमी जी के वरिष्ठ रहे और मैं उनका कनिष्ठ प्रिय पात्र रहा।एक कारण इस घनिष्ठता के पीछे प्रकृति प्रदत्त था , वह यह कि हम दोनों के परिवार मूलतः राजस्थान के झालावाड़ जिले के थे और दोनों परिवारों की कार्यस्थली मालवा बनी।मेरी उनसे छुटपन की मुलाकात का कोई विशेष ध्यान रहा नहीं, मगर खरगोन कॉलेज में 1981 में उनका कवि रुप देखा, तय यह था कि सांस्कृतिक सचिव के रुप में उनका अभिनंदन मैं करुंगा।उनका अच्छा सा परिचय देने के बाद ,अभिनंदन पश्चात् जब कवि सम्मेलन की शुरुआत मुझसे कराई गई ,एक तो कनिष्ठता की वजह ,दूसरे छात्र नेता के रुप में और क्षेत्रीय कवि होने के कारण हूट और शूट होने का कोई कारण नहीं था ,और कवि सम्मेलन जम गया।एक के बाद एक कवि गण अपनी रचनाएं पढ़ते रहे और जब बारी आई हाशमी साहब की तब उनकी रचनाओं की गहराई के बावजूद सरलता ने सबको चकित कर दिया और आज भी याद है कि पांच मिनिट तक तालियां बजती रही।एकता जी शबनम, सत्यनारायण जी सत्तन, शरद जोशी जी आदि उस समय मंच पर थे। रात्रि आठ बजे से शुरू होने वाला कवि सम्मेलन साढ़े बारह बजे तक समाप्त होने वाला था मगर चला सुबह पांच बजे तक ,उनकी जो छाप और धाक निमाड़ में पड़ी की वहां की गर्मी भी उनके सामने फीकी पड़ती गई।एक सिलसिला हाशमी साहब के साथ कवि सम्मेलन का चला जो मेरे वर्दी वाली सेवा में आने तक बदस्तूर जारी रहा।सेवा शर्तों और आवश्यकताओं ने कवि सम्मेलन में भाग लेने पर रोक लगा दी,साहित्य सृजन चलता रहा और जब कभी मौका बेमौका मुलाकात होती रही , हाशमी साहब का स्नेह निरंतर ,चिरंतन रहा।
सन 2011 में मेरे प्रथम व्यंग्य संग्रह” अन्ना का सुख , अन्ना का दुःख ” का विमोचन इंदौर में होलकरों के राज प्रासाद माणिकबाग पैलेस में हिंदी दिवस के दिन 14 सितंबर को होना था, किसे बुलाया जाए तब मैंने अपनी पहली पसंद में श्रद्धेय हाशमी जी का नाम लिया,और सभी वरिष्ठ अधिकारियों ने उसका अनुमोदन कर दिया, नियत दिन और समय पर वे पधारे, अब कार्यक्रम शुरु होने पर उनका औपचारिक परिचय भी मुझे ही देना था, एक घंटे का संक्षिप्त कार्यक्रम था,हमारे कार्यालय की परम्परा थी कि पांच बजे शाम को कार्यक्रम शुरु हो और छह बजते ही समाप्ति हो ताकि महिला कर्मचारियों ,अधिकारियों को रोका नहीं जा सके।केंद्रीय उत्पाद शुल्क ,सीमा शुल्क के कार्यालयों में वैसे भी साहित्य का स्थान नहीं होता, सीमित बजट, ज्यादातर बाहर के अधिकारी जिन्हें स्थानीयता से कोई सरोकार नहीं होता फिर अंग्रेजियत के माहौल में हिंदी को बचाना ,बढ़ाना हिमालय पर चढ़ाई जैसा होता है।कार्यक्रम में डेढ़ सौ का सभा कक्ष भरना मुश्किल, मगर अनुशासन गजब का रहता था, बीच कार्यक्रम में कोई उठ नहीं सकता।हाशमी साहब के हिस्से तीस मिनिट किए गए थे, कम ज्यादा पांच मिनिट। कार्यक्रम में उस दिन कई प्रतिमान बनने थे यह हमें भी ज्ञात नहीं था। परिचय की शुरुआत मैंने भगवान भरोसे की थी, चूंकि विधिवत परिचय के लिए हाशमी साहब से संपर्क ही नहीं कर पाया मगर एक हौंसला था, विश्वास था कि अच्छा परिचय दे सकूंगा। मैंने हाशमी साहब के नाम की व्याख्या से शुरुआत की,,,ये अज़हर हैं अर्थात् जो जहर नहीं हैं अर्थात् अमृत हैं, अमृत घट हैं,,,एक बारगी पूरा सभा कक्ष सन्नाटे में डूब गया और दूसरे ही क्षण जो तालियां बजी तो बजती रही ,और उसी वक्त मैंने कह दिया कि यह वह विराट व्यक्तित्व हैं जिनका परिचय मैं नहीं दे सकता क्योंकि वे खुद अपना परिचय हैं,,,,क्या आप सोच सकते हैं कि एक बड़े और स्तरीय कार्यक्रम में मुख्य अतिथि का इतना भर परिचय दिया जाए कि वे एक उद्भट साहित्यकार हैं जहां बमुश्किल उंगलियों पर गिने जा सकने वाले लोग हाशमी साहब से परिचित थे।
मैंने स्टेज पर हाशमी साहब को दीप प्रज्ज्वलन हेतु आमंत्रित किया , सारे उच्च अधिकारी मुझे ताकते रहे,मुस्लिम व्यक्ति को कैसे दीप प्रज्ज्वलन के लिए कह रहे हो,अघोषित सभी के चेहरे पर यही प्रश्न था, मगर जब हाशमी साहब ने दीप प्रज्ज्वलन के साथ वेद की ऋचाएं सस्वर पढ़ना चालू की तो सभाकक्ष में फिर आश्चर्य मिश्रित सन्नाटा था, इतनी सुंदरता और सटीकता से ,मधुर स्वर में ,स्पष्ट उच्चारण के साथ पहली मर्तबा सभी को सही अर्थों में देवी की वंदना, अभ्यर्थना का भाव समझ में आया, पूरा सभा भवन भाव विभोर था और उसके बाद मेरे प्रथम व्यंग्य संग्रह का विमोचन हाशमी साहब के कर कमलों से हुआ।उसकी प्रथम कृति भी हाशमी साहब ने ही ग्यारह प्रति से ग्यारह सौ रुपयों का प्रसाद देकर खरीदी , यह उनका ही पुण्यानुबंध था कि बिना ज्यादा प्रचार किए मात्र दो माह में मेरी करीब आठ सौ प्रतियां बिक गईं , जिसमें से मूल खर्च काटकर शेष राशि मंदबुद्धि बच्चों के सहायतार्थ संस्थाओं को भेंट दी गई।
जब हाशमी साहब ने उद्बोधन चालू किया तब तीस मिनिट कब निकले पता ही नहीं चला , पूरा हॉल खचाखच भरा हुआ एक भी कुर्सी खाली नहीं थी, कुछ अधिकारी दो कुर्सी पर तीन बैठे थे, कुछ पीछे खड़े रहे और कभी होलकर महाराजा यशवंतराव जी के इस नृत्य कक्ष में इतने व्यक्ति एक साथ कभी किसी कार्यक्रम में नहीं समाए थे, जितने आज थे।हाशमी जी का प्रबोधन कब पौन घंटा पार कर गया पता ही नहीं चला, बीच में हाशमी जी ने आयुक्त महोदय से समय का पूछा तो उन्होंने कह दिया आप जब तक बोलना चाहें ,अनुमति है,हिंदी ठीक से न जानने वाले भी उस दिन मंत्रमुग्ध होकर बैठे रहे। रसिक श्रोता और वक्ता का ऐसा दुर्लभ संयोग बहुत ही बिरला अनुभव रहा, जिसे बरसों बाद भी इंदौर के श्रोता नहीं भूले हैं और न हाशमी साहब इस आयोजन को कभी भूले , जब भी मिले हर बार उन्होंने अंतर्मन से इस आयोजन को याद किया, उनकी आंखों की चमक उस आनंद के अतिरेक को बताती हैं।उस दिन सभा कक्ष में बैठा प्रत्येक श्रोता जिस श्रद्धा भाव से मूर्तिमंत था ,वैसा सैकड़ों की संख्या में कार्यक्रम किए जाने और भाग लेने के बाद भी कहीं नजर नहीं आया। कार्यक्रम अनवरत जारी रहा और साढ़े सात बजे तक चला, न किसी को घर जाने की जल्दी थी और न कोई उठने को तैयार था, सबको उस अमृत पान का अलभ्य आनंद था जो अज़हर जी ने बरसाया था और अमृत घट का मेरा कहा गया शब्दशः उन्होंने सिद्ध कर दिया था।उनकी जिव्हा पर विराजित मां सरस्वती का निर्झर प्रसाद हम सभी ने अभिभूत होकर ग्रहण किया। यह हाशमी साहब की पुण्याई है, खुदा की उन पर मेहरबानी है,प्रभु की महती कृपा है जिसकी सत्ता को निरंतर मानते हुए उन्होंने सेवा की है और उनकी मानव सेवा का जो जज़्बा है यह उसी का प्रसाद है कि उनकी अंतरात्मा से ,सादगी और सरलता से ,उनकी लेखनी से जो भी निकलता है, जो रचा जाता है वह अमर हो जाता है।उनकी लेखनी से कई कंकर प्रेरणा पाकर शंकर हुए ,गिनती करना मुश्किल है।
कुछ वर्ष बाद मेरी रतलाम पदस्थापना हुई, सबसे पहले ज्वाइन करते ही हाशमी साहब को फोन किया और बताया कि आज ज्वाइन किया है और आपसे आशीर्वाद लेने तीन बजे करीब आऊंगा जब वहां की एक बड़ी दवाई कंपनी में भेंट देने जाऊंगा ,उस वक्त करीब दो बज रहा था। करीब सवा तीन बजे उनके घर पहुंचा तो एक मेला सा लगा था,सोचा कोई कार्यक्रम होगा, जब भीतर पहुंचा तब ज्ञात हुआ कि उनके महाविद्यालयीन छात्रों के संगठन द्वारा मेरा सम्मान रखा गया है, श्री विनोद जी संघवी ,बहुप्रसारित दैनिक चेतना के प्रधान संपादक और उनके अन्य अंतरंग मित्रों के साथ, पूरे मीडिया के लोग वहां उपस्थित थे ,मैं यह देखकर अभिभूत था कि हम शासकीय प्रशासनिक सेवा और वर्दी वाली सेवा के व्यक्ति जिस प्रोटोकॉल के मास्टर माने जाते हैं उन्हें इस महाविद्यालयीन महा मास्टर ने मात दे दी थी।यह उनके स्निग्ध ,निश्चल प्रेम और स्नेह का प्रतीक था। स्व अनुशासन की उनकी सीख थी, यही उनका परिवार और उसकी एकता की शक्ति है।दूसरे दिन रतलाम के सभी समाचार पत्रों और स्थानीय चैनलों में मेरे सम्मान के फोटो और दृश्य देखकर, नतीजा यह हुआ कि कार्यालय में मिलने वालों का तांता लग गया और मुझे तत्काल जावरा,मंदसौर के दौरे पर निकलना था सो मुलाकातें मुल्तवी कर निकलना पड़ा।रतलाम से मात्र साढ़े तीन माह में वापस स्थानांतरण इंदौर होने से हाशमी साहब के साथ हर सप्ताह एक डेढ़ घंटे बिताने का आनंद छूट गया।अपरिमित स्नेह का बंधन तो है मगर प्रत्यक्ष मिलने की निरंतरता में कमी रह गई।
इस बीच मेरी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह इंदौर में नखराली ढाणी में मनाई गई, निमंत्रण के समय साहब बाहर थे ,सुबह मुंबई से आकर रतलाम सात बजे आए मगर वादे के मुताबिक साढ़े ग्यारह बजे आयोजन में शिरकत की और हमें अपने आशीर्वाद से नवाजा।पिता जी के साथ राजस्थानी साफे में दोनों ने साथ खाना खाया,पिताजी नहीं रहे, पर हाशमी जी के होते हुए सदैव वह पूर्ति होती रही।जब कभी इंदौर में श्रद्धेय सत्यनारायण जी सत्तन से मुलाकात होती है तो वे बड़ी उत्सुकता से मुझसे कहते हैं कि प्रभु से बात तो करा दो, हमारा फोन तो उठाते नहीं हैं और तब हाशमी साहब से बात कर वे तृप्त हो जाते हैं, यह दो विद्वानों की आत्मा का मिलन होता है और उसके मिलन का पुण्यभागी बन जाता हूं।
हाशमी साहब के कई आयाम हैं, लेखक ,कवि,गीतकार, प्रबोधन कार, गज़ल कार, ज्योतिषी में उन्हें महारथ हासिल है,जिसके कई नमूने मैंने देखे हैं। कई प्रशासनिक अधिकारियों को उनके उपग्रह की तरह चक्कर लगाते देखा है।एक फकीर सा व्यवहार और नेता हो या अधिकारी जो व्यापार करे उससे उनकी आत्मीय दूरी का निर्वहन करते हुए मैंने महसूस किया है।वे अपनी पवित्र आत्मा को कलुषित होने से बचाने अथवा किसी के आग्रह को न टालने के लिए ऐसा कुछ करते हैं ताकि आत्मा पर बोझ न पड़े और उन्हें फिर प्रायश्चित न करना पड़े।किसी महान संत की आत्मा उनमें बसती है ,उनका सौम्य ऋषिवत व्यवहार उसकी गवाही देता है,अहिंसक विचार धारा और वैसे ही कर्म ,उनकी आत्मा में रची बसी क्षमा याचना की अहर्निश प्रदीप्त ज्योति और परोपकार की नीति, उन जैसा दूसरा कोई साहित्यकार था तो वह सूर्यकांत त्रिपाठी निराला थे ,जो हाथ में आया वह गरीब जन के लिए लुटा दिया,हाशमी साहब किसी कवि सम्मेलन में जाते तो पचास हजार रुपए उन्हें पारिश्रमिक मिलता था ,जिसमें से वे मात्र पांच सौ रुपए अपने पास रखते थे, और बाकी पूरी राशि गरीब यतीम महिलाओं ,बुजुर्गों ,लाचार व्यक्तियों, अपंगों आदि की सेवा में अपना कर्तव्य मान समर्पित कर देते थे।
मानवता की अक्षुण्ण सेवा के महाव्रति इस महामानव का बारम्बार वंदन है, अभिनंदन है, नमन है।
रतलाम की धरती में पुण्यता का बीज वपन है, जिसके कारण एक से एक मनीषी इसे अपनी कर्मस्थली बनाते हैं और वहां के जन सौभाग्यशाली हैं जिसके कारण उन्हें इनका अप्रतिम , अलभ्य, दुर्लभ सत्संग मिलता है। जागृत प्रभु दर्शन करना हो तो एक ही पता है हाशमी निवास, 32 इंदिरा नगर ,रतलाम।उनकी चरण रज से कितने ही लाभान्वित हुए और हमें खुशी है कि हम उनके कृपा पात्र,समकालीन हुए, और स्नेह का आशीष पाते रहे।प्रभु से एक ही निवेदन है कि वे उन्हें स्वर्णिम मुक्ति दे और हम सब की दुआएं उन्हें लगे, जैसे कि वे सभी के लिए सदैव दुआएं करते हैं, वही परावर्तित हो, द्विगुणित हो और उन्हें सदा की तरह स्मृति आकाश में ज्वाज्ज्वल्यमान रखे।

अरुण कुमार जैन
आई आर एस
विद्या नगर, इंदौर 452001
arunkumarjain28@gmail.com
MO. 9826011099

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