लेखक – प्रो. देवेन्द्र कुमार शर्मा,रतलाम
समाज में सामाजिक विषमता में निरंतर वृद्धि हो रही है। समाज और परिवार बंटते जा रहे हैं, विभक्त हो रहे हैं। परिवार में आपसी वैमनस्य बढ़ता ही जा रहा है। कुछ वर्षों पूर्व तक परिवार में जो सामांजस्य और सौहार्द होता था वह अब गायब हो रहा है। भाईयों-भाईयों में मनमुटाव आम बात हो गई है। पति-पत्नी के बीच भी जो प्रेम, सौहार्द और सामांजस्य हुआ करता था वह अब बहुत कम परिवारों में दिखाई देता है। यह विषमता परिवार के मूलभूत ढांचे को प्रभावित कर रही है, कमजोर कर रही है। अधिकतर लोगों का जीवन एक औपचारिकता, चलती का नाम गाड़ी, रह गया है। समाज के कर्णधारों – उपदेशकों को इस पर चिंतित होकर विचार करना चाहिए। यदि समय रहते ही इस विघटनकारी प्रवृत्ति को रोका नहीं गया तो भारतीय समाज पश्चिमी समाज की तरह आधारहीन हो जाएगा। सभी जानते हैं कि पश्चिम की भौतिक सभ्यता ने वहां का आधार भूत ढांचा ही चरमरा दिया है। वहां स्त्री पुरूष सभी दो तीन अथवा अधिक भी विवाह करते हैं। यह पति-पत्नी में आपसी विश्वास और सामांजस्य की कमी से होता है। लोगों की सहनशीलता कम होती जा रही है। कोई भी एक-दूसरे को समझने को तैयार नहीं। इस सामाजिक विषमता और विघटन से व्यक्ति मन से दुःखी होता जा रहा है। इसी विषमता पर विचार करें।
परिवार समाज की आधारभूत इकाई है। जब से मनुष्य सभ्य हुआ तब से परिवार ही मनुष्य की सुरक्षा का आधार है। परिवार ही मनुष्य को सुख शांति और भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है। परिवार में सामांजस्य रहने से मानसिक संतोष प्राप्त होता है। परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम से अद्भुत भावनात्मक शांति प्राप्त होती है। युग-युग से पूर्वज पारिवारिक व्यवस्था में सुखी और संतोष पूर्ण जीवन व्यतित करते आए हैं। कई बार व्यक्तिगत मतभेद के बाद भी संयुक्त परिवार विभक्त नहीं होते थे। पिताजी कहा करते थे कि परिवार को पानी की तरह समझना चाहिए। जिस तरह से एक लट्ठ मारकर पानी को विभाजित नहीं कर सकते इसी प्रकार परिवार को समझना चाहिए। भावनात्मक रिश्ता ही पानी की तरह होता है, जिसको आसानी से विभाजित नहीं किया जा सकता। किन्तु अब होने लगा है। कारण कई होते हैं। अब भौतिक कारण भावनात्मक एकता पर हावी होने लगे हैं।
भारत भी पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित होने लगा है। यह धारणा जीवन प्रधान होती जा रही है कि जितना अधिक पैसा, उतना अधिक सुख यह भ्रम है। सुख कोई वस्तु नहीं जिसे धन से खरीदा जा सके। दुर्भाग्य से अब लोग यही समझने लगे हैं; परिणाम में जीवन में निराशा उत्पन्न होती है। कई प्रकरण देखने में आते हैं कि पति – पत्नी योग्य समझदार फिर भी मतभेद। कोई भी एक दूसरे को समझने और सहयोग करने के लिए तैयार नहीं। परिणाम स्वरूप जीवन खोखला अनुभव होता है। आजकल ऐसे प्रकरणों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। सभी जानते हैं, समाचार पत्र ऐसी खबरों से भरे पड़े हैं। भाईयों में मतभेद और विभाजन आम बात हो गई है। जहां संपत्ति का विवाद नहीं होता वहां भी मतभेद बढ़ते ही जा रहे हैं। यहां तक की आपस में बोल चाल तक नहीं होती। जब कोई इस दुनिया से विदा हो जाता है तब सिर मुण्डवाते हैं – समाज को दिखाने के लिए। दिखावा दुःख का आधार नहीं हो सकता।
जीवन में सामांजस्य के लिए समझदार मन और विवेकपूर्ण, मस्तिष्क चाहिए। त्रुटियां सभी से होती हैं इन्हें गंभीरता से न लेकर उदार मन से आगे बढ़ना चाहिए। एक-दूसरे को क्षमा करने की भावना जीवन में बहुत सारी समस्याओं का निराकरण कर देती है। प्रायः देखने में आया है कि दूसरों को तो क्षमा कर देते हैं किन्तु अपनों को नहीं। जीवन से उदार दृष्टिकोण गायब ही हो गया है। शायद विषाद की एक टीस सभी के मन में होती है पर स्वीकार नहीं करते। निरर्थक व्यक्तिगत अहम इसका मूल कारण है। थोड़ी से समझ व उदारता जीवन की अधिकतर समस्याएं का निराकरण किया जा सकता हैं।