


रतलाम 25 जुलाई । चातुर्मास के दौरान स्टेशन रोड स्थित चद्रप्रभ दिगम्बर जैन मंदिर में चल रहीं धर्मसभा मे आज परम पूज्य आचार्य 108 श्री विशुद्ध सागर जी के परम शिष्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर म. सा. ने अपनी अमृतवाणी मे व्यक्त करते हुए जैन रामायण पदम् चारित्र को समझाते हुए बताया कि राम बने कैसे..? यह आपको आपकी आत्माराम ही बताएगा। नीचे गिरे हुए व्यक्ति को तो कोई भी उठा देगा परंतु भाव से गिरे व्यक्ति को कोई नहीं उठाएगा। इसलिए शारीरिक रूप से भले ही गिर जाओ, मदद के लिए कोई न कोई आ ही जाएगा परंतु मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को कोई नहीं उठाता उसे स्वयं उठाना पड़ता है।
हे चेतन, तू निज को जान,कर ले निज वस्तु का भान, तू स्वयं ही है भगवान
जैसे जब एक चित्र देखने से चित्र प्रशस्त हो जाता है और एक चित्र देखे हैं तो विशुद्ध से भर जाते हैं।वह चलचित्र मत देखो, चलचित्र के दास मत बनो चारित्र के दास बनो। हमेशा अच्छा देखो अच्छा सुनो अच्छा बोलो और जो आप पढ़ रहे हो, सुन रहे हो उसे कंठस्थ कर लो अंटी का दाम और कंठ की विद्या जिसके पास है वह हमेशा आराम से रहते है। ऐसे ही भगवान ने तीन काल, चार विद्या, पांच आस्तिकाए, छः द्रव्य,सात तत्व,आठ कर्म, 9 पदार्थ के बारे में भगवान आदिनाथ ने बताये।
मोहनिय कर्म को जीत लो सबको जीत लोगे, रसिंद्रीय को जीत लोगे तो सबको जीत लोगे, ब्रह्मचर्य को का पालन करोगे तो ओज और तेज बढ़ेगा। मन में अशुद्ध, अशुभ भावों को धो लिया करो जैसे कपड़ों को धोते हैं तो मन साफ शुद्ध हो जाएगा। पड़ा- पड़ा ज्ञान,पड़ा पड़ा अनाज, तवे पर पड़े पड़े रोटी जल जाती है इसलिए बुद्धि को काम देते रहो हाथ पैर हिलाते रहो वाहन को यमराज कहा जाता है वाहनों के भरोसे मत रहो टाइम का मैनेजमेंट बनाओ। मन को क्रिएटिव करो। शरीर की रक्षा के साथ शुभ विचार भी रखना चाहिए यह रसायन की क्रिया है और मूनिर्वत तलवार की धार पर चलने जैसा है मुनि व्रत दुर्धर है, पूरे जीवन में अपने दान नहीं किया तो पत्थर जैसा है जीवन हो जाता है। इसलिए दान की भावना होना चाहिए शरीर में राज नहीं होना चाहिए धर्म के साथ आगे चले और बड़े ऐसी भावना रखनी चाहिए धर्म बढ़ाने के लिए भावना भी कट्टर होना चाहिए हम सभी को अपनी समर्थ के अनुसार व्यवहार बढ़ाना चाहिए आत्मकल्याण की भावना से तो शून्य हो जाओगे इसलिए व्यवहार और दृष्टि दोनों होनी चाहिए।
न धर्मा धार्मिक्यै बिना
धार्मिक कुंभ के बिना धर्म नहीं होता मोक्ष मार्ग की दृष्टि पर दोनों ही दृष्टि आवश्यक है व्यवहार और पंच परमेष्ठी को भूलना नहीं।उक्त बात अपने प्रवचन में कहीं। कल प्रातः 8:30 बजे भरत चक्रवर्ती – बाहुबली वैराग्य का वर्णन करेंगे।
दिगंबर जैन समाज के सभी समाज जन महिलाएं , पुरुष उपस्थित थे। उक्त जानकारी श्री चंद्रप्रभ दिगम्बर जैन श्रावक संघ रतलाम के संयोजक मांगीलाल जैन ने दी।