

रतलाम, 2 अगस्त 2025। श्री चन्द्रप्रभ दिगम्बर जैन मंदिर में चातुर्मास के अवसर पर चल रहे धर्मसभा में परम पूज्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर जी महाराज ने आज अपने ओजस्वी प्रवचन में बताया कि
सदा ना भूले केतकी, सदा न सावन होय”
केतकी का फूल सदा नहीं खिलता, और सावन (बारिश का सुंदर मौसम) भी हमेशा नहीं रहता। जीवन में हर सुंदर, शुभ या अनुकूल स्थिति हमेशा नहीं रहती। जैसे केतकी का फूल एक समय विशेष पर ही खिलता है, वैसे ही सुख, समृद्धि, यश, शक्ति आदि भी समय पर आधारित होते हैं।सावन की हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता भी चिरस्थायी नहीं होती।
इच्छा का जब अंतरकरण में प्रादुर्भाव होता है तो वह छटपटाने लगती है और जब शांत होता है तो मनुष्य को अपने कर्मों का भान होने लगता है कि वह अच्छा कर रहा है या बुरा। परंतु सच्चे गुरु शिष्य को मार्गदर्शन करते रहते हैं सच्चे गुरु वह है जो मोक्ष मार्ग पर चलाने वाले होते हैं। सच्चे गुरु पाप से भयभीत होते हैं पाप भी वही संसार बनाने वाली कथाओं से, ज्ञान से, रक्षा कर सकता है इसलिए डरना सीखो। पाप भीरू व्यक्ति की स्थिति बीज जैसी होती है। संसार में हर व्यक्ति बड़ा बनना चाहता है गुरु बनना चाहता है पर बड़ा कैसे बने वह बीज से सीखो, बीज सबसे पहले खेत में पहुंचा, मिट्टी में डला, पानी में भीगा,सूर्य की तपन से सुखा किसान के हल भी जुता, तब जाकर के वह पौधा पल्लवित होता है फसल देने लगता है। फल देने लगता है। इसी तरीके से बड़ा बन सकते हैं संघर्ष करना पड़ता है साधु भी अपनी साधना में रत रहते हैं वह भी बीज के समान है बड़ा होने के लिए बड़ा जैसी वृद्धि को प्राप्त करना होता है प्रत्येक जीव का क्रमिक विकास है। एक रात में कोई बड़ा नहीं बनता।एक रात में भगवान नहीं बनता। भगवान पारसनाथ को भी 10 भव लगे।
शिष्य का अर्थ है जो गुरु के शासन में चले और आज्ञा पालन करें।जीवन में उदय को मत देखो बंध को देखो,बंध पर भी दृष्टि है तो विवेक जागृत रहेगा। पाप का बंध हो गया तो गुरु से प्रायश्चित ले लो। उदय को ही नहीं बंध को भी देखो उदय में पुण्य बढ़ा को पाप का अपकर्षण प्राप्त हो जाएगा। जिस तरह से आप अपने शरीर के मल को छोड़ने में देरी नहीं करते,उसी प्रकार कषाय के मल को भी छोड़ने में देरी नहीं करना चाहिए, अशुभ कर्म को छोड़ने में भी देरी नहीं करना चाहिए। अशुभ भाव कषाय दिल में आए तो उसे दिमाग में नहीं ले जाए उन्हें वही खत्म कर दें।
सम्यक दर्शन के बारे में मसा ने बताया कि जो वेद,शास्त्र, गुरु पर अकाट्य विश्वास, श्रद्धा रखते हैं व अपनात्व की रुचि उनमें सही गलत में रुचि रखने एवं मानना से पुण्य प्राप्त हो जाएगा।
प्रतिक्रमण का अर्थ है अपने पापों का ध्यान कर लेना भगवान व गुरु की सामिप्ता में समाप्त कर लेने की क्रिया को प्रतिक्रमण कहते हैं।आप अपना पुरुषार्थ बढ़ते जाओ आपकी आत्मा ऑटोमेटिक महान हो जाएगी। जिनको सुख सुविधा चाहिए उन्हें विद्या नहीं मिलती और जिन्हें विद्या चाहिए उन्हें सुख सुविधा नहीं मिलती संसार को तोड़ना है तो छात्र जैसे बनो आईआईटी के छात्र भी अभ्यास करते हैं और मोक्ष पाना है तो जिनवाणी को अपना जीवन में उतार लो तो यह जन्म सफल हो जाएगा और आगे का जन्म भी सुधर जाएगा। उक्त बात अपनी व्याख्यान माला में कहीं। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जन उपस्थित रहे और मुनि श्री के उद्बोधन का लाभ प्राप्त किया।उक्त जानकारी श्री चन्द्रप्रभ दिगम्बर जैन श्रावक संघ रतलाम के संयोजक मांगीलाल जैन ने दी।