“एक आंख बंद हुई… और दो जीवन रोशन हो गए”

विनोद कोठारी के नेत्रदान से दो जरूरतमंदों को मिली नई दृष्टि

रतलाम 4 अगस्त | कहते हैं, मृत्यु अंत नहीं… किसी और की शुरुआत हो सकती है। सुश्रावक विनोद कोठारी ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी समाज को कुछ लौटाने का संकल्प निभाया। उनके निधन के उपरांत नेत्रदान के माध्यम से दो जरूरतमंदों की दुनिया अब उजियारी हो गई है। यह न सिर्फ एक संवेदनशील निर्णय था, बल्कि समाज को सेवा, संवेदना और जागरूकता का जीवंत संदेश भी है।
इस पुण्य कार्य का सफल समन्वय ‘नेत्रम संस्था’ द्वारा किया गया। संस्था के प्रतिनिधि हेमन्त मूणत ने बताया कि विनोद कोठारी के सुपुत्र नितिन कोठारी एवं परिजनों को यशवंत गंग और शलभ अग्रवाल ने नेत्रदान हेतु प्रेरित किया। सहमति के तत्काल बाद डॉ. जी.एल. ददरवाल को सूचित किया गया, जो अपनी टीम – मनीष तलाच एवं मोहनलाल राठौड़ – के साथ तत्परता से कोठारी के निवास पर पहुँचे और नेत्र संरक्षण की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूर्ण किया।
इस भावनात्मक क्षण में अनेक स्नेहीजन, शुभचिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता जैसे ओमप्रकाश अग्रवाल, भगवान ढलवानी, शलभ अग्रवाल, यशवंत गंग आदि उपस्थित रहे। नेत्रम संस्था ने कोठारी परिवार के इस निर्णय को “अंधकार में उजास की लौ” बताया है और समाज से अपील की है कि मृत्यु के बाद भी जीवन देने वाले इस कार्य में सहभागी बनें।