अपने जीवन में धर्म को स्थान दें – महासती श्री दर्शनाश्री जी म. सा. ठाणा-3

जावरा (अभय सुराणा) । आचार्य भगवन श्री रामलाल जी म.सा.की आज्ञानुवर्तिनी शासन दीपिका महासती श्री दर्शनाश्री जी म. सा. ठाणा 3 समता भवन जवाहर पथ पर सुखसाता पूर्वक विराजमान है !पर्युषण महापर्व पर तप त्याग धर्म ध्यान अनंतगढ़ सूत्र वाचन जिनवाणी की निर्मल गंगा निरंतर प्रवाहमान है ।
साध्वी श्री सुसिद्धि श्री जी ने पर्युषण के छठे दिवस धर्म सभा में कहा कि भवन की मजबूती नींव के आधार पर होती है , वृक्ष की मजबूती जड़ के आधार पर होती है , शरीर की मजबूती पथ्य परहेज पालन के आधार पर होती है व्यक्ति की मजबूती व्यक्ति की सम्यक सोच और समझ के आधार पर होती है । हम अपनी सोच को सही बनाएं समझ को विकसित करें । ब्रह्मचर्य की महिमा बताते हुए साध्वी श्री ने कहा कि ब्रह्म यानि आत्मा के शुद्ध भाव , चर्य यानि रमण करना । पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले को स्पर्श करने पर अनेक बीमारियां ठीक हो जाती है । भीष्म पितामह ने पूरे जीवन अखंड ब्रह्मचर्य का पालन किया । ब्रह्मचर्य में बहुत शक्ति होती है । स्वामी दयानंद सरस्वती और अरिष्ट नेमि का उदाहरण देते हुए आपने ब्रह्मचर्य का महत्व बताया । गृहस्थ जीवन में रहने वाला व्यक्ति यदि मर्यादित जीवन जीता है और मर्यादा में रहकर ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करता है तो वह व्यक्ति धनी होता है । ब्रह्मचर्य के समक्ष देव, दानव, यक्ष, राक्षस, किन्नर सभी नमन करते हैं। हमारी आत्मा निरंतर पतन की ओर जा रही है । मन में संशय से आत्मा का विनाश होता है । धर्मपत्नी वह होती है, जो धर्म के काम में सदा साथ दे । मर्यादा में जीवन जीते हुए हमेशा चिंतन करें की एक दिन में भी पूर्ण ब्रह्मचारी बनूंगा । छः काय के जीवों की रक्षा हम कब कर सकते हैं ? जब धर्म हमारे जीवन में रंगा हुआ हो । धर्म को उत्कृष्ट मंगल कहा गया है । धर्म जिस व्यक्ति के भीतर में रहा हुआ है अर्थात अहिंसा संयम और तप जीवन में है तो उसे देवता भी नमस्कार करते हैं । धर्म और धन दोनों की एक राशि है पर दोनों का मिलन एक नहीं है । आज दुनिया धन के रंग में रंगी हुई है , धन के प्रति आसक्ति में लगी हुई है , धन को ही प्राण मानती है, धन के पैर नहीं है पर दुनिया धन से ही चलती है । अपने जीवन में हम धर्म को स्थान दें । जब तक इंद्रिया सशक्त है तब तक धर्म को जीवन में उतारने की प्रेरणा साध्वी श्री ने दी। धर्म भव भव तक हमारा साथ देने वाला है, धन तो केवल यही तक साथ देगा और जब पुण्यवानी कमजोर होती है तो सब धन भी चला जाता है । एक समय की साधना भी अशुभ कर्मों को शुभ बना सकती है । आपने कहा कि जिनवाणी पर श्रद्धा रखो पावरफुल- तो जीवन हो जाएगा सक्सेसफुल ।
साध्वी श्री सुरिद्धी श्री जी म सा ने फरमाया कि साधु संतों के दर्शन करने से हमारे नेत्र पवित्र हो जाते हैं जिनवाणी सुनने से अनंत कर्मों का क्षय होता है । जब तक आत्मा नहीं जागती है तब तक हमारे चरण धर्म स्थान में नहीं पड़ते हैं । धर्म के प्रति विश्वास रखो, हो सकता है आज दिन अच्छा नहीं है पर आने वाले दिन आपके बहुत ही अच्छे होंगे, हम जिनवाणी के प्रति श्रद्धावान बने ।
धर्म और धन गृहस्थ जीवन में दोनों आवश्यक है , धन के बिना परिवार नहीं चल सकता और धर्म के बिना हम पुण्यवानी अर्जित नहीं कर सकते।
महासती सरिद्धि श्रीजी महाराज साहब ने कहा कि संसार कि प्रत्येक भटकती हुई आत्मा ऊपर उठना चाहती है और प्रभु महावीर जिनवाणी में ऊपर उठने का ही फरमा रहे हैं , गरीब व्यक्ति नहीं चाहता कि मैं गरीब रहूं और अनपढ़ व्यक्ति नहीं चाहता कि मैं अनपढ़ रहूं …वह भी अपने जीवन में उत्थान करना चाहता है, पुण्य कर्मों के द्वारा यदि आपने जीवन को को भर लिया तो समझना आपने अपने जीवन का उत्थान कर लिया । शुभ भाव से यदि दान दिया है तो निश्चित रूप से पुण्य वानी बंधेगी । संसार में अनेक आत्माएं पैरों तले रौंदी जा रही है । आत्मिक आनंद से दिया हुआ दान सोने का काम करता है जबकि यश कीर्ति से दिया हुआ दान चांदी का काम करता है । बिना भावना के दान देंगे तो वह तांबे का काम करता है और मजबूरी में दान देंगे तो वह लोहे का काम करता है । दान छाप कर नहीं हमेशा छुपा कर दो । यदि जिनवाणी को आचरण में नहीं उतारा तो जिनवाणी सुनने से कोई फायदा होने वाला नहीं है । अपने वह नहीं होते जो तस्वीर में साथ होते हैं , अपने तो वह होते हैं जो तकलीफ में साथ देते हैं।
उक्त जानकारी संघ मंत्री प्रदीप सेठिया ने दी।

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