


रतलाम 28 अगस्त । श्रुति संवर्धन वर्षा योग 2025,श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर स्टेशन रोड, रतलाम आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी म. सा. के शिष्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर जी म.सा. एवं क्षुल्लक 105 श्री परम योग सागर जी म.सा. द्वारा चंद्रप्रभा मंदिर मे पाट पर विराजित है।
मुनि श्री ने अपने प्रवचन श्रृंखला लोकेंद्र भवनमें कहा कि जो साल भर भी मंदिर नहीं आ पाए साधना नहीं कर पाते उनके लिए यह संधि पर्व है उनके लिए ही यह दश लक्षण महामंडल विधान है। अगर जीवन में सर्वार्थ सिद्धि चाहिए तो कल उसका को मां के मेल को चिड़चिड़ाहट को अनकंफर्ट को छोड़ना पड़ेगा और क्षमा करना होगा। मुनि मैं यही पाई जाती है और श्रावक को भी इसका पालन करना चाहिए। जो क्रोध करता है वह इंसान के लाने योग्य नहीं है। क्रोध उत्पन्न होने से स्वभाव, चरित्र, यश आदि को नष्ट कर देता है। यह भी जीवन में तीन कारणों से आता है जर, जोरू और जमीन। कारण से कारण उत्पन्न होता है धन की आवश्यकता जब नहीं थी जब नहीं कमाते थे तब तुम्हारा स्वभाव क्या था और अब कमाने लग गए हो तो तुम्हारा स्वभाव क्या हो गया है। मन की नहीं होने पर असंतुष्ट होते हो और पहले मन की नहीं होती थी तब भी संतुष्ट थे। इसलिए अपने मूल स्वभाव को पहचानो। जब छोटे थे तब कषायो के,पापों के,आसक्ति के गुलाम नहीं थे और अब गुलाम हो गए हो। जो प्रतिकूलता में भी साम्यभाव स्थापित कर दे वही क्षमा है। क्षमा मूर्ति बना है तो देर रखना पड़ेगा धैर्य से ही क्षमा उत्पन्न होती है और धैर्य धरती जैसा रखना है। जहां देव, शास्त्र, गुरु, धर्मात्मा विराजित होते हैं वह स्थान पूज्य बन जाता है। अपने स्वभाव में क्रोध को छोड़ने का प्रयास करना चाहिए और शांत स्वभाव आना चाहिए कंप्रोमाइज किए बिना ग्रहस्त नहीं चल सकता है। अगर क्रोध आए तो उसे जगह से अलग हो जाएगी स्थान परिवर्तन कर दीजिए हर व्यक्ति को दोष के साथ स्वीकार करना आना चाहिए। हर व्यक्ति को अपने दोष दिखाई नहीं देते और दूसरों का दोष पहाड़ जैसा लगता है इसलिए अपने आप पर नियंत्रण होना चाहिए ग्रंथ का मूल आधार अपेक्षा होना है इसलिए किसी से भी अपेक्षा मत रखिए। मन का होना पुण्य है, और मन का ना होना महा पुण्य है क्योंकि उसमें ईश्वर की सत्ता होती है यह चीज समझ जाओगे तो जीवन समझ जाओगे। जीवन में उपेक्षा आएगी तो अपने आप अपेक्षा समाप्त हो जाएगी। क्रोध का अंत पश्चाताप से होता है इसलिए क्रोध ना करें उसके लिए स्थान परिवर्तन कर दीजिए तो क्रोध भी स्वतः समाप्त हो जाएगा।
अगर आपको सिद्यालय में पहुंचता है तो क्षमा रुपी मिसाइल चलानी पड़ेगी। जब तक आत्मा क्रोधाग्नि से अलग नहीं होगी तब तक उठ नहीं पाएगी। क्रोध और कर्म के भाव हल्के होते हैं तो सिद्धालय जा सकते हैं। उक्त बात अपनी प्रवचन श्रृंखला में कहीं।जिसका आयोजन श्री चंद्र प्रभ दिगंबर जैन श्रावक संघ, श्री विद्या सिंधु महिला मंडल, श्री विमल सन्मति युवा मंच एवं निवेदक सकल दिगंबर जैन समाज रतलाम की ओर से किया जा रहा है।उक्त जानकारी मंदिर समिति श्रावक संघ के संयोजक मांगीलाल जैन ने दी।