बुद्धि, तन, धन और वाणी का सार – पूज्या श्री किरणप्रभा जी

रतलाम । बुद्धि का सार : बुध्दि फलम तत्व विचारणम च अर्थात बुद्धि मिली है तत्व पर विचार करना चाहिये। तत्वों को समझने वाला विवेक से कार्य करता है।
तन का सार : देहस्य सारं व्रतधारणम च: । अर्थात देह मिली है तो व्रत धारण करना चाहिए। श्रावक को 12 व्रत और साधु को 5 महाव्रत धारण करना चाहिए।
धन का सार – अर्थस्य सारं सुपात्र दानं । इंसान दान करते वक्त 10 बार विचार करता है। लेकिन मौज मस्ती में पैसा उड़ाने के वक्त वो जरा भी विचार नही करता है।
वाणी का सार : प्रीतिकर वचनम।
वाणी श्रष्टि का चमत्कार है। वाणी के कई प्रकार है प्रिय वाणी, अप्रिय वाणी, कोमल वाणी, कर्कश वाणी। कौवा मुंडेर पर आकर कांव कांव करता तो हम उसे तुरंत भगा देते है । और कोयल की कुक सुनकर आप प्रसन्न होते है । हमारी वाणी हमारे वंश का कुल का परिचय देती है । वाणी से हम दोस्त और दुश्मन बना लेते है । अनन्त पुण्य के उदय से हमें यह सुस्पष्ट वाणी मिली है, केवल इंसान को ही स्पष्ट वाणी का वरदान प्राप्त है इसलिये हमें इस वाणी का दुरुपयोग नही करना चाहिए सत्य और प्रिय बोलो। मधुर बोलो बड़ा आनन्द आएगा बोलने से पहले तोलो बड़ा आंनद आएगा। गर्व से रहित वाणी बोलो। मेरे घर चलो की जगह हमारे घर पधारो दोनों बातों का मतलब एक ही है लेकिन दोनों का प्रभाव बहुत अलग है। हमेशा मैं मैं करने वाला अहंकारी होता है । बकरी भी मैं मैं करती है और उसका अंत क्या होता है ये सब जानते है। यह सारगर्भित प्रवचन पूज्या श्री किरणप्रभा जी म. सा. ने नीमचौक स्थानक की महती धर्मसभा में प्रदान किये। ।।
पूज्या श्री रत्नज्योति जी म.सा. ने फरमाया की अपनी आत्मा की सम्भाल करो क्योंकि एक दिन सबको जाना है जवानी निकल रही है बूढ़ापा दस्तक दे रहा है लेकिन आजकल 70-80 साल का बुजुर्ग भी अपने आप को बूढा मानने को तैयार नही है। बालो को काला कर लेता है, कम सुनाए तो कान में मशीन लगा लेगा, आँखों में लेंस, मुँह में नई बत्तीसी, घुटने भी बदलवा लेता है, कितना भी छुपा लो दबा लो बुढापे की झलक सामने आ ही जाती है।
आजकल की महिलाएं कपड़ो गहनों और श्रंगार पर अनाप शनाप खर्च करती है और इस खर्च को पूरा करने के लिये इंसान नैतिक अनैतिक सभी रास्तों से धन कमाने का कार्य करता है।
18-18 पापों का सेवन करके बड़ी मेहनत करके ढेर सारा धन कमाते हो लेकिन साथ में एक कौड़ी भी नही जाती है। परिवार वाले ही सब गहने उतार लेते है और तो और अगर दाँत में सोना लगा हो तो दाँत तोड़कर वो 2/4 माशा सोना भी निकाल लेते है। आये भी नगन थे जाओगे तब भी नगन जाओगे इस आने जाने के बीच में छगन और मगन (परिवार औऱ दोस्त) मिल जाते है और हम उनके फेर में जीवन भर उलझते रहते है। इस संसार में रहकर भी अपने जीवन को हम तप, त्याग, विनय, विवेक के द्वारा उत्तम बना सकते है।