कानून से समाज सुधार संभव नहीं

लेखक – प्रो. देवेन्द्र कुमार शर्मा,रतलाम

यूजीसी विवाद सर्वविदित है, इस कानून द्वारा शिक्षा संस्थानों में असमानता और संभावित अन्याय को दूर करने की कोशिश की गई हैं, ऐसा कहा जाता है। इस कानून द्वारा उत्पन्न विवाद सर्वविदित है। उसका जो विरोध हो रहा है वह भी बहुत प्रभावी और विस्तृत है। देश में छुआछूत और रिजर्वेशन आदि के को ई कानून पहले से ही उपलब्ध है। समय-समय पर उनसे विवाद होते रहते हैं। समाज में आंतरिक रूप से विषमता और मतभेद होते रहते हैं। उन कानून के प्रभाव और दुष्प्रभाव से सभी परिचित है। सवर्ण समाज इन कानूनों से हमेशा बहुत आहत रहा है।अब यूजीसी कानून के रूप में युवाओं के बीच में अन्याय हटाने की कोशिश की गई हैं, ऐसा कहा जाता है। इस यूजीसी कानून पर उच्चतम न्यायालय ने वर्तमान में प्रतिबंध लगा दिया है। परिणाम कुछ भी हो हमारा मंतव्य यह विचार करना है कि क्या कानून द्वारा बिना मतभेद के सामाजिक समानता और सौजन्यता समाज में लाई जा सकती हैं।
यह बात सर्वविदित है कि भारत में सदियों से छुआछूत और जातिवाद बहुत प्रभावी ढंग से प्रचलित रहा है। इस सामाजिक विषमता को हटाने के प्रयास आजादी के पहले से होते रहे है। आजादी के बाद छुआछूत संबंधी कानून बनें। साथ ही नौकरियों में आरक्षण के लिए भी कानूनी व्यवस्था की गई। प्रारंभ में सीमित संख्या में की गई आरक्षण की व्यवस्था सरकारें बढ़ाती ही गई। वर्तमान में आरक्षण 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। कुछ अन्य समाज भी जो आरक्षण की सूची में नहीं आते वे भी समय-समय पर आरक्षण के लिए आंदोलन करते रहते हैं। हमारा उद्देश्य आरक्षण कानूनों के औचित्य और वैधता पर विचार करना नहीं है। हमारा उद्देश्य निरपेक्ष रूप से यह विचार करना है कि ऐसे कानूनों का वास्तविक प्रभाव सामाजिक व्यवस्था पर क्या होता है। क्या ऐसे कानून सामाजिक विषमता दूर करने के उद्देश्य में सफल होते हैं?
ज्योति बा फुले ने 19वीं सदी में महिला शिक्षा, दलितों के उत्थान और जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ क्रांतिकारी मुहिम शुरू की थी। उन्होंने 1848 में अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ कन्याओं के लिए देश का पहला स्कूल खोला, 1873 में सत्यशोधक समाज का गठन किया, विधवा पुर्नविवाह का समर्थन किया और बाल विवाह का कड़ा विरोध किया। महात्मा गांधी ने भी छुआछूत और जातिवाद के विरूद्ध प्रभावी कार्य किया। इन सभी ने बिना कानून की सहायता के सामाजिक समरसता को प्रभावी रूप से स्थापित करने में सफलता पाई। सामाजिक सुधार के सभी कानूनों का मूल उद्देश्य समाज से विषमता और असमानता दूर करना होता है। विचार करना चाहिए कि क्या विषमता के आधार पर सजा का प्रावधान करने वाले कानून अपने उद्देश्य में सफल होते है?
यह बात तो तय है कि सामाजिक विषमता केवल कानून द्वारा समाप्त नहीं की जा सकती। जो भी कानून बने हैं उनसे समाज के विभिन्न वर्गों में आंतरिक विषमता बड़ी है। समाज के विभिन्न वर्गों के मन में एक-दूसरे के प्रति सामंजस्य और समरूपता उत्पन्न नहीं हो पाई। एक तरफ कई धर्म गुरू और समाज सुधारक हिन्दुओं में जातिवाद और सामाजिक विषमता को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर नए कानून समाज में विषमता बढ़ा रहे हैं। सभी समझदार और उदार मन के हिन्दूओं में सामाजिक मतभेद और भेदभाव को समाप्त करना चाहते हैं। कानून पर विचार करना और उसकी विवेचना करना माननीय उच्चतम न्यायालय का कार्यक्षेत्र है। हम तो जागरूक नागरिक के नाते यह मानते है कि अब लोगों का दृष्टिकोण बहुत बदल चुका हैं और सामाजिक विषमता बुद्धिमानी और उदारता से दूर की जा सकती है और समाप्त भी हो रही हैं। अतः सामाजिक समस्याओं के निराकरण का काम जागरूक सामाजिक सुधारको पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

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