लोगस्स की यात्रा अंधेरे से उजाले की यात्रा है क्रोध वैर वैमनस्य के जाले को खत्म करने की यात्रा है – आगमज्ञाता डॉ. समकित मुनि जी म.सा.

रतलाम। नीमचौक स्थानक विषय लोगस्स की महिमा के द्वितीय दिन आगमज्ञाता डॉ. समकित मुनि जी म.सा. ने धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि लोगस्स की यात्रा अंधेरे से उजाले की यात्रा है क्रोध वैर वैमनस्य के जाले को खत्म करने की यात्रा है । लोगस्स का पाठ करने से रोज जो घरों में वैचारिक एक्सीडेंट होते है वो खत्म हो जाते है।
लोगस्स के पाठ में ऐसे प्रकाशमई शब्दों का वर्णन है जिनका उच्चारण करते ही भक्ति की यात्रा शुरू हो जाती है। बहुत कम ऐसे शब्द होते है जिनका उच्चारण करते ही परमात्मा से जुड़ जाते है ।
लोगस्स में एक वाक्य आता है आरोग्गबोहीलाभम मतलब सही समझ देना। भविष्य सही समझ से ही बनता है । दौलत मिल गई और सही समझ नही मिली तो भविष्य खराब होना तय है।
समय है लेकिन समझ नही है तो समय का दुरुपयोग होना तय है । भोजन बढिय़ा से बढिय़ा मिला लेकिन खाने की अकल नही है तो खाया हुआ भोजन ही बीमार कर देगा।
आगम में कहा गया है की अन्न औषधी है लेकिन यदि कोई अन्न खाकर बीमार हो जाए तो यह समझ का दोष है। समाहिवरम-उत्तम दिन्तु : अर्थात लोगग्स की आराधना से मुझे उत्तम श्रेणी की समाधि प्राप्त हो।
अशांति देने के लिये पूरी दुनिया है, लेकिन उन अशांति के पलों में शांत रह सकूं एसी उत्तम समाधि की कामना है। लोगस्स की साधना हमारे भीतर की ऊर्जा को इतना बढ़ा देती है की अपने आप को किसी भी स्थिति में कंट्रोल कर लेते है ।
गुस्से को कंट्रोल करना है तो लोगग्स की आराधना करो। कर्म निर्जरा धार्मिक क्रिया में नही समाधी में है । केशलोच एक धार्मिक क्रिया है उससे कर्म निर्जरा नही होती है लेकिन यदि लोच के समय समाधि बनी रहे तो कर्म निर्जरा होती है । लोच के समय तकलीफ होती है, परेशानी होती है और अगर उस वक्त यह भाव आ जाए की यह कैसी परम्परा है इसमें कितना कष्ट है इसमें शिथिलता होना चाहिए तो ऐसे लोच से कर्म निर्जरा नही बल्कि कर्म बन्ध हो जाता है।
पैदल विहार में कष्टों को सहते हुए भी यदि समाधि बनी रहे तो कर्म निर्जरा होती है। इसलिये प्रभु से यही कामना है की समाधि बनी रहे मन में उथल पुथल न हो । हम संतो की तीखुत्तो के पाठ से 3 बार वंदना करते है, लेकिन वंदना के बाद जैसी संत से आकांक्षा थी वैसा प्रत्युत्तर नही मिला तो क्या उस वक्त भी संत के प्रति आपकी समाधि बनी रहेगी। २गौशालक ने प्रभु महावीर पर तेजुलेस्या प्रहार किया लेकिन वो प्रभु की समाधि को डिगा नही पाया उनकी शांति छीन नही पाया ।
हमारी समाधि मजबूत बने छोटे छोटे कारणों से हमारी समाधि भंग न हो इसके लिए लोगस्स की आराधना करना चाहिए।
संगमदेव में प्रभु महावीर को लगातार 6 माह तक परेशान किया, न केवल उन्हें शारीरिक यातना दी बल्कि ऐसा माहौल बना दिया की 6 माह तक उन्हें शुध्द गौचरी नही मिल पाई। लेकिन इससे वो प्रभु की समाधि को ध्वस्त नही कर पाया । कुछ लोगो को संगमदेव की तरह दूसरे लोगो को सताने में मजा आता है । लेकिन सामने वाला भले ही हमें सताए लेकिन यदि हम उसके सताने पर भी परेशान न हो कोई प्रतिक्रिया न दे तो सामने वाला पस्त हो जाएगा, जैसे संगमदेव प्रभु के सामने पस्त हुए। प्रभु महावीर को 6 माह लग गए संगमदेव को पस्त करने में तो हमें कितना समय लगेगा इसकी कल्पना कर लो ।
दुश्मन किस तरह आक्रमण करेगा ये हमे पता नही होता है लेकिन आक्रमण को खत्म करने के लिये यदि हमारा डिफेंस मजबूत हो तो आक्रमणकारी का आक्रमण फैल होना तय है। इसी प्रकार कोई कितना भी परेशान करे लेकिन यदि हमारा आत्मबल मजबूत है डिफेंस मजबूत है तो वो हमारी समाधि नही छीन सकता है। हराने वाले हार जाएंगे यदि खुद की समाधि स्ट्रांग हो। जब कोई अकारण परेशान करे तो उसे संगमदेव मानो और खुद को प्रभु महावीर का अनुयायी।
भोजन करने के बैठे और थाली में मनपसंद भोजन नही मिले तो लडऩे मत बैठ जाओ, उस वक्त बनाने वाले के बारे में सोचो की कितनी बार सब्जी सुधारते वक्तव्य हाथों में चाकू से चोट लगी होगी, कितनी बार तेल के छीटे उड़े होंगे। जिस दिन भोजन मनपसंद न मिले उस दिन भोजन को प्रसाद जैसा समझ जैसे प्रसाद को झूठा नही डालते है । बहुत ही श्रद्धापूर्वक प्रसाद की माफिक ग्रहण कर लो। छोटी छोटी बातो में हम अपनी समाधि बनाए रख सके यही कामना करना चाहिए।