लेखक: पंकज व्यास
भारत की पावन मिट्टी की यह तासीर रही है कि यहाँ हर युग में ऋषियों, संतों और मनीषियों ने वैश्विक एकता का पाठ पढ़ाया है। आज के दौर में, जब विश्व वैचारिक संकीर्णता और मतभेदों के चौराहे पर खड़ा है, तब हमारे अंतर्मन से केवल एक ही पुकार आनी चाहिए— “सबका हो एक ही अरमान, भारत में हो सर्व धर्म सम्भाव।” यह विचार केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का मूल आधार है।
‘सर्व धर्म सम्भाव’ का अर्थ केवल धार्मिक सहिष्णुता (Tolerance) मात्र नहीं है। यह उससे कहीं ऊपर ‘आत्मीय स्वीकार्यता’ (Acceptance) का भाव है। यह वह महान जीवन-दर्शन है जो हमें सिखाता है कि सत्य तक पहुँचने के मार्ग भिन्न हो सकते हैं, किंतु गंतव्य सदैव एक ही होता है। जिस प्रकार विभिन्न दिशाओं से बहने वाली नदियाँ अंततः सागर में ही विलीन होती हैं, ठीक उसी प्रकार सभी पूजा-पद्धतियों का मूल ध्येय मानवता की सेवा और उस परम सत्ता की प्राप्ति है।
भारत की वास्तविक सुंदरता उसकी विविधता में निहित है। यहाँ मस्जिद की अज़ान, मंदिर की आरती, गुरुद्वारे की अरदास और चर्च की प्रार्थनाएँ मिलकर एक ऐसा सुरम्य संगीत रचती हैं, जो विश्व में अन्यत्र कहीं सुलभ नहीं है। जब हम ‘सर्व धर्म सम्भाव’ को आत्मसात करते हैं, तो राष्ट्र की नींव और भी गहरी हो जाती है। यह विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो हमें दुनिया के अन्य देशों से अलग और महान बनाती है।
जब समाज में कटुता और द्वेष का स्थान प्रेम, करुणा और परस्पर सहयोग ले लेता है, तो देश की अखंडता अक्षुण्ण हो जाती है। ‘सम्भाव’ का अर्थ है कि कोई भी बाहरी शक्ति हमें विखंडित करने का दुस्साहस नहीं कर पाएगी, क्योंकि हमारी वास्तविक शक्ति हमारे अटूट आंतरिक जुड़ाव में है। एक समरस समाज ही वह उर्वर भूमि है जहाँ शांति और समृद्धि के फूल खिल सकते हैं, और जहाँ हर नागरिक सुरक्षित महसूस करता है।
वर्तमान समय में विशेषकर युवा पीढ़ी का यह दायित्व है कि वे सोशल मीडिया के भ्रामक प्रचारों और संकुचित विचारधाराओं से ऊपर उठकर ‘मानवता’ के धर्म को पहचानें। हमें एक ऐसे समावेशी वातावरण का निर्माण करना होगा, जहाँ किसी व्यक्ति का पंथ उसकी पहचान तो हो, परंतु वह किसी भी प्रकार के भेदभाव या ऊँच-नीच का आधार न बने। जब समाज व्यर्थ के विवादों से मुक्त होता है, तब राष्ट्र की संपूर्ण ऊर्जा शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी नवाचार जैसे सृजनात्मक कार्यों में लगती है।
“सबका हो एक ही अरमान” मात्र एक भावुक पंक्ति नहीं है, बल्कि यह एक समृद्ध, सशक्त और आधुनिक भारत का संकल्प है। जिस दिन हम परधर्म को भी अपने धर्म के समान सम्मान देने लगेंगे, उस दिन भारत वास्तविक अर्थों में ‘विश्व गुरु’ के पद पर प्रतिष्ठित होगा। आइए, हम सब मिलकर इस पावन अरमान को एक जीवंत हकीकत में बदलें और एक ऐसे स्वर्णिम भारत की रचना करें जहाँ केवल प्रेम और भाईचारे की भाषा बोली जाए। “मजहब तो जोड़ता है, तोड़ना सियासत का काम है, इंसानियत ही सबसे ऊँचा, सच्चा मजहब और नाम है।”