कर्म बंधन का मूल कारण राग द्वेष : डॉ. राजेन्द्रमुनि म.सा.

फरीदकोट । जैन स्थानक फरिकोट में प्रवचन करते हुए डॉ. राजेन्द्र मुनि ने संसार भव भ्रमम का मूल कारण राग द्वेष को बतलाते हुए इसी से कर्मो का बंधन जीवन में निरंतर जारी रहता है । मानव मन का स्वभाव सा बन गया है जो प्रतिफल रागद्वेष भाव में जीता रहता है । वह या तो भूतकालीन बातों का स्मरण कर या फिर भविष्यकालीन बातों की कल्पना करता हुआ व्यर्थ में कर्म बांधता है। अपना वर्तमान समय इसी के चलते व्यर्थ में समाप्त कर लेता है । ज्ञानीजन को अधिक से अधिक वर्तमान में जीवन जीना चाहिए, जिसका वर्तमान सुखी बन जाता उसका भूत भविष्य स्वत: सुखमय बीत जाता है । काम, क्रोध, मद, मोह के वशीभूत होकर वह राग भाव में समय का अपव्यय करता है। मोह के चलते परिग्रह को असीमिति मात्रा में बढ़ता रहता है किन्तु अंतिम समय सबकुछ रिश्ते नाते परिग्रह धुल जाते है । दुख से मुक्त होने का एकमात्रकारण राग को छोड़ संयम भाव को अपनाना है । प्रत्येक पदार्थो में संयम आवश्यक है । सभा में साहित्यकार सुरेन्द मुनि द्वारा जीवन की व्याख्या करते हुए द्वय क्षैत्रकाल भाव के उपयोग या दुरूपयोग की व्याख्या करते हुए मुम्मन सेठ का उदाहरण प्रस्तुत किया गया । जिसके पास अपार सम्पत्ति होते हुए दुखमय जीवन व्यतित कर के परभव को प्राप्त कर लेता है । प्रधान प्रवक्ता जैन मंत्री पंकज जैन ने सूचना दी कि ३१ मार्च को जैन कालोनी पहुंचगे।