आशीष दशोत्तर
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महावीर स्वामी कहने का नहीं , करने का नाम है । महावीर स्वामी बसने का नहीं , बहने का नाम है । महावीर स्वामी रहने का नहीं , रचने का नाम है । महावीर स्वामी थमने का नहीं , चलने का नाम है । महावीर स्वामी जपने का नहीं जंचने का नाम है । महावीर स्वामी सितम का नहीं, संयम का नाम है। महावीर स्वामी महज प्रतिमा का प्रसार नहीं, मोह और आसक्ति से विहार , संयमित व्यवहार है। महावीर स्वामी अनुकरण और अनुसरण के बीच विद्यमान भ्रम को दूर करने का ज्ञान है।
यह समय महावीर स्वामी के पथ पर चलने का समय है । यह समय महावीर स्वामी के विचारों को आत्मसात करने का समय है । यह समय महावीर स्वामी का अनुसरण करने का समय है । यह समय महावीर स्वामी के संयम को धारने का समय है । यह अपने भीतर के जीव को पुकारने का समय है।
आत्मनियंत्रण और अहिंसा
पूरी दुनिया जब युद्ध की विभीषिका से जल रही है। हर देश अपने से कमज़ोर पर कब्ज़ा करने की नीयत रख रहा है। हर ताक़तवर किसी न किसी निर्बल को अपने अधीन करने की तरफ़ अग्रसर है , ऐसे समय में महावीर स्वामी का स्मरण बहुत आवश्यक है। महावीर स्वामी ने अपने से दुर्बल पर अधिकार करने, किसी को परतंत्र बनाने , किसी पर शासन करने की बजाए यह कहा कि स्वयं पर शासन करना सीखें । महावीर स्वामी का दर्शन आत्म चिंतन , आत्म संयम और आत्म अनुशासन का महत्व बताता है। महावीर कहते हैं कि खुद पर विजय प्राप्त करना, लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है। शांति और आत्मनियंत्रण ही सही मायने में अहिंसा है। हर जीवित प्राणी के प्रति दयाभाव ही अहिंसा है। सभी जीवित प्राणियों के प्रति सम्मान का भाव ही अहिंसा है। हर जीव के प्रति सम्मान, हर प्राणी के प्रति दया भाव और हर विचार के प्रति लगाव, महावीर स्वामी सिखाते हैं । वे कहते हैं कि घृणा से मनुष्य का विनाश होता है। घृणा से विचारों में विद्रूपता आती है । घृणा से व्यवहार में विसंगति आती है ।घृणा से मन में ईर्ष्या भाव उत्पन्न होता है । घृणा से अलगाव होता है , इसलिए मनुष्य को किसी से घृणा नहीं करनी चाहिए, बल्कि सभी के प्रति प्रेम का भाव रखना चाहिए । यह प्रेम तभी उत्पन्न हो सकता है, जब सभी को अपने समान जीने का स्वप्न देखा जाए । ख़ुद भी जिएं और दूसरों को भी जीने दें । यही भाव मनुष्यता को पूर्णता प्रदान करता है।
आनंद बाहर से नहीं आता
सुख , समृद्धि और सुकून की तलाश में भटकते मनुष्य को महावीर स्वामी का दर्शन जीवन की सत्यता के क़रीब लाता है। बहुत सी ज़मीन पर कब्ज़ा करने , अपनी चल-अचल संपत्ति का फैलाव करने , किसी की मदद के नाम पर उसका शोषण करने , किसी को मार्ग दिखाने के नाम पर बरगलाने से सुख प्राप्त नहीं होता है । महावीर स्वामी कहते हैं, प्रत्येक आत्मा स्वयं में सर्वज्ञ और आनंदमय है। आनंद बाहर से नहीं आता। आनंद तो मनुष्य के भीतर ही होता है लेकिन वह उस आनंद को छोड़कर बाहरी सुखों को तलाशने के लिए इतना भटकता कि अपने आप पर नियंत्रण खो बैठता है । वह ख़्वाहिशों की चाह में एक सतही दुनिया की तरफ़ , अंधकारमय दुनिया की तरफ़ अग्रसर हो जाता है । इस दौर में उसके रिश्ते टूट जाते हैं , उसके साथी छूट जाते हैं , उसके अपने रूठ जाते हैं, लेकिन वह धन और यश प्राप्ति के लिए भटकता ही रहता है । परंतु ज़िन्दगी में एक मोड़ ऐसा भी आता है , जब उसे इन सब की आवश्यकता नहीं होती । महावीर स्वामी कहते हैं , ऐसे समय में उसे सुख अपने भीतर ही खोजना पड़ता है । जब सुख अपने भीतर ही है तो उसे खोजने के लिए सही मार्ग पर क्यों न चला जाए ? जीवन को प्रारंभ से संयम, नियम ,अपरिग्रह , अनासक्ति और सही आचरण की तरफ मोड़ दिया जाए तो वह जीवन सार्थक होता है और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होता है ।
महावीर स्वामी कहते हैं कि वीर वही है जो किसी को क्षमा भी कर दे और अपनी ओर से क्षमा याचना भी कर ले। अहंकारी व्यक्ति क्षमाभाव नहीं रखता इसीलिए वह अतृप्त रहता है। क्षमा के बारे में भगवान महावीर कहते हैं- ‘मैं सब जीवों से क्षमा चाहता हूँ। जगत के सभी जीवों के प्रति मेरा मैत्रीभाव है। मेरा किसी से वैर नहीं है। मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूँ। सब जीवों से मैं सारे अपराधों की क्षमा माँगता हूँ। सब जीवों ने मेरे प्रति जो अपराध किए हैं, उन्हें मैं क्षमा करता हूँ।’ इसी क्षमा भाव की आज दुनिया को आवश्यकता है।
महावीर स्वामी का दर्शन और चिंतन इस पूरी दुनिया के लिए आज भी एक सबक है। अपने पराक्रम से अपना परचम फैलाने में लगी यह दुनिया और इस दुनिया का प्रत्येक मनुष्य महावीर स्वामी की एक छोटी सी बात को भी अपने जीवन में अपना ले तो उसका जीवन सार्थक हो सकता है।