आलेख- डॉ.सुनीता जैन
(शासकीय कन्या महाविद्यालय में कार्यरत )

चार साल की एक मासूम बच्ची अपनी बुआ से कहती है
“मां ने आपसे बात करने को मना किया है… पर आप मां को मत बताना।”
आठ साल के ध्रुव के हाथो में लड्डुओं का डिब्बा देकर उसकी मां कहती है
“यह मामा को दे देना… पर किसी को बताना मत।”
ये छोटे-छोटे वाक्य सुनने में सामान्य लग सकते हैं,
लेकिन सच यह है कि —
“किसी को मत बताना” जैसे शब्द बच्चों के जीवन की दिशा तय कर देते हैं।
यहीं से शुरुआत होती है उस आदत की,
जहाँ बच्चा सच छुपाना सीखता है,
बातों को इधर-उधर पहुंचाना सीखता है,
और अपनी ओर से उसमें कुछ जोड़ना भी सीख जाता है।
उसे सिखाया जाता है —
“जाकर देखो वो क्या कर रहा है…”
“उसने क्या कहा, आकर बताना…”
“ध्यान रखना, कहीं कुछ छुपा तो नहीं रहा…”
धीरे-धीरे वह घर के हर कोने पर नज़र रखने लगता है।
इतना ही नहीं, कई बार उसका उपयोग घर के सदस्यों को
आपस में लडाने और भिड़ाने के लिए भी किया जाता है।
और अनजाने में ही,
वह बच्चा एक मासूम बालक से बदलकर
“खबरी लाल” की भूमिका निभाने लगता है।
शुरुआत में यह सब उसे खेल जैसा लगता है,
उसे लगता है कि वह कोई खास काम कर रहा है।
लेकिन यही “खास काम” धीरे-धीरे उसकी आदत बन जाता है,
और फिर वही आदत उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है।
जिस उम्र में उन्हें अपने भविष्य की मजबूत नींव रखनी चाहिए,
उसी समय उन्हें घर की चुगली और इधर-उधर की बातों में उलझा दिया जाता है।
बचपन, जो सच्चाई, ईमानदारी और संस्कार सीखने का समय होता है,
वह संदेह, चुगलखोरी और छुपाने की प्रवृत्ति में बदल जाता है।
न कोई उसे पढ़ाई का महत्व समझाता है,
न ही स्वास्थ्य और अच्छे संस्कारों की सीख दी जाती है।
जब सही मार्गदर्शन नहीं मिलता,
तो बच्चे मनमर्जी से जीना सीख जाते हैं
मनमर्जी से खाना, पीना, उठना, बैठना…
और धीरे-धीरे अनुशासन उनसे दूर होता चला जाता है।
सबसे गंभीर बात यह है कि —
आज हम उन्हें सिखाते हैं “यह बात किसी को मत बताना”,
और कल वही बच्चे हमसे भी बातें छुपाने लगते हैं।
जब वे डरते हैं — नहीं बताते।
जब वे गलती करते हैं — नहीं बताते।
जब उन्हें मार्गदर्शन की जरूरत होती है — तब भी नहीं बताते।
क्योंकि उनके मन में यह बैठ चुका होता है कि
हर बात बताना जरूरी नहीं होता।
समय बीतता है…
और एक दिन वही बच्चे,
अपने बचपन में उनके मन में भरा गया जहर,
उन्हीं लोगों पर उड़ेल देते हैं
जिन्होंने कभी उनके मन में वह जहर भरा था।
तब रिश्तों में दूरी होती है,
विश्वास टूटता है,
और पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचता।
इसलिए आज जरूरत है रुककर सोचने की
क्या हम अपने बच्चों को एक सच्चा इंसान बना रहे हैं,
या अनजाने में उन्हें केवल एक माध्यम बना रहे हैं,
जो बातें इधर-उधर पहुंचाता है?
बच्चे हमारे शब्दों से नहीं,
हमारे व्यवहार से सीखते हैं।
अगर हम उन्हें सच्चाई सिखाएंगे,
तो वे ईमानदार बनेंगे।
अगर हम उन्हें विश्वास देंगे,
तो वे मजबूत रिश्ते बनाएंगे।
लेकिन अगर हमने उन्हें बचपन में ही
चुगलखोरी और बातें छुपाना सिखा दिया,
तो वही आदतें उनके पूरे जीवन को प्रभावित करेंगी।
और यही जो हम उन्हें आज सिखा रहे हैं वो लौटकर आपके पास ही आएगा ।
आइए, एक संकल्प लें
हम बच्चों को “किसी को मत बताना” नहीं,
बल्कि “सही और सच बात कहना” सिखाएंगे।
हम उन्हें खबरी नहीं,
एक सच्चा, संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान बनाएंगे।
क्योंकि
बचपन सिर्फ उम्र नहीं होता,
वह पूरे जीवन की बुनियाद होता है।