बाल संस्कार : बच्चों के कोमल मन में दुर्भावना के बीज ना बोए

आलेख – डॉ.सुनीता जैन
(शासकीय कन्या महाविद्यालय में कार्यरत )

बच्चे तो बच्चे ही होते हैं…
मन के सच्चे, निर्मल और निष्कपट।
यूँ ही नहीं कहा जाता— “बच्चे मन के सच्चे होते हैं।”
उनकी दुनिया में कोई अपना–पराया नहीं होता,
कोई ऊँच–नीच नहीं होती,
कोई भेदभाव नहीं होता।
उनके लिए तो हर रिश्ता बस “अपना” होता है।
लेकिन धीरे-धीरे…
हम बड़े उनके इस निष्कलुष मन में
मतभेद और दुर्भावना के बीज बोने लगते हैं।
“उसका लाया मत खाना…”
“उससे बात मत करना…”
“उसके घर मत जाना…”
ये शब्द जब हम बार-बार उनके सामने रखते हैं,
तो उनके मन में प्रश्न उठने लगते हैं—
“पहले तो सब ठीक था… अब ऐसा क्यों?”
वे बोल नहीं पाते,
डर के कारण पूछ नहीं पाते,
पर भीतर ही भीतर उलझते रहते हैं।
उनका मासूम मन समझ नहीं पाता कि
जो लोग कभी अपने थे,
आज अचानक पराए कैसे हो गए?
समय बीतता है…
और वही बच्चे एक दिन बड़े हो जाते हैं।
फिर वे लौटाते हैं—
वही व्यवहार, वही दूरी, वही कठोरता
जो उन्होंने बचपन में सीखी थी।
और फिर…
वे आपस में भी एक-दूसरे के साथ
वही व्यवहार दोहराने लगते हैं।
एक ऐसा चक्र शुरू हो जाता है,
जहाँ रिश्तों में दूरी पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती जाती है।
क्योंकि सच यही है—
बच्चे हमेशा बच्चे नहीं रहते,
वे बड़े होकर वही बन जाते हैं
जो हम उन्हें बनाते हैं।
इसलिए ज़रूरी है कि हम
उनके मन में प्रेम, अपनापन और सम्मान बोएं,
ना कि दूरी और द्वेष।
क्योंकि आने वाला कल
उनके आज पर ही निर्भर करता है।

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