क्रोध, ईर्ष्या और असत्य से बचकर ही आत्मकल्याण संभव: मुनि श्री निर्णय सागर जी म.सा.

स्टेशन रोड स्थित चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में हुए प्रवचन

रतलाम 21 अप्रैल । स्टेशन रोड स्थित चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में विराजित पूज्य मुनि श्री 108 निर्णय सागर जी म.सा. एवं छुल्लक श्री 105 तत्व सागर जी मसा. के सान्निध्य में धर्मसभा आयोजित हुई। इस अवसर पर मुनि श्री निर्णय सागर जी मसा. ने प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य के भीतर उठने वाली ईर्ष्या, क्रोध और द्वेष ही उसके पतन का मुख्य कारण बनते हैं।
मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे जंगल में आग फैलती है, वैसे ही मन में उत्पन्न ईर्ष्या भी धीरे-धीरे पूरे व्यक्तित्व को जला देती है। जब मनुष्य दूसरों की उन्नति देखकर दुखी होता है, तब वह विवेक खो देता है और सही-गलत का निर्णय नहीं कर पाता।
उन्होंने रामायण प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि रावण ने क्रोध और अहंकार के कारण अपने ही भाई विभीषण की सद्बुद्धि को नहीं माना और अंततः अपना सर्वनाश कर लिया। इससे स्पष्ट होता है कि अहंकार और क्रोध व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाते हैं।
मुनि श्री ने कहा कि आज मनुष्य अपने दुखों से कम और दूसरों के सुख से अधिक दुखी है। यही भावना उसे गलत कार्यों की ओर प्रेरित करती है। उन्होंने समझाया कि अपने भीतर के भावों को नियंत्रित रखना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि हमारे कर्म ही हमें फल प्रदान करते हैं।
प्रवचन में सत्य की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि सत्य मनुष्य को ऊंचाई पर ले जाता है, जबकि असत्य उसे पतन की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि पेड़-पौधों में भी जीवन और संवेदनाएं होती हैं, इसलिए प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और संवेदनशीलता रखना चाहिए।
अंत में मुनि श्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने विचार, वाणी और आचरण को शुद्ध रखें, क्योंकि जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति है।
धर्मसभा में चंद्रप्रभ दिगंबर श्रावक संघ सहित समाज जन, श्रद्धालु उपस्थित रहे। उक्त जानकारी अनुराग जैन व मांगीलाल जैन ने दी।

Play sound